मंगलवार, 31 मई 2011

फेसबुक पर तरह तरह की स्माइली लगाने के कोड

गूगल की कुछ मजेदार ट्रिक्स

गूगल की कुछ मजेदार ट्रिक्स
  1. गूगल.कॉम खोले.
  2. सर्च बॉक्स में सर्च लिखे.

फेसबुक के शोर्टकट्स

ब्लॉगर साथियों, फेसबुक के तो आप शोकीन होंगे ही. इस पर भी आप शोर्टकट्स उपयोग कर सकते है. पेश है कुछ शोर्टकट्स-

ताजमहल का टूर बिना खर्चे के



दोस्तों, ताजमहल को देखने की तमन्ना किस के मन में नहीं है, अगर आप भी ताजमहल देखना चाहते है लेकिन वक्त नहीं होने के कारण नहीं जा पा रहे है

वर्चुअल पिआनो ऑनलाइन

दोस्तों, अगर आपको भी पिआनो बजाने का शौक है और मेरी तरह खर्चा नहीं उठा पा रहे तो परेशान मत होईये.

फेसबुक के लिए डेस्कटॉप मेसेंजर

गूगल टॉक जिस प्रकार से डेस्कटॉप पर बातचीत की सुविधा देता है उसी प्रकार यह मेसेंजर भी फेसबुक के लिए यही सुविधा प्रदान करता है.

तकनीक से सम्बंधित जानकारियाँ आज से

दोस्तों, आज से इस चिट्ठे पर तकनीकी से संबंधित जानकारियां भी प्रकाशित की जाएगी।
नवीन जी से अनुरोध करके इस चिट्ठे को हिंदी तकनीक समूह में जोड़ने का कहा है।

रविवार, 8 मई 2011

नशा विरोधी पोस्टर


भ्रूण हत्या विरोधी पोस्टर


दहेज विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


मृत्युभोज विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा व अनमेल विवाह रोकें


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर

नशा विरोधी पोस्टर

बाल विवाह

नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर



नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर


नशा विरोधी पोस्टर

नशा विरोधी पोस्टर

नशा विरोधी पोस्टर

शराब जहरीली नागिन है।


एमपी३ प्लेयर के संबंध में


आप अपने लिए एक बढ़िया-सा नन्हा सा पोर्टेबल, पर्सनल एमपी३ प्लेयर ख़रीदना चाहते हैं? या ख़रीद चुके हैं? आइए, आज आपको कुछ युक्तियाँ बताते हैं ताकि आपकी ख़रीद बढ़िया हो और अगर आप ख़रीद चुके हों तो आप अपने प्लेयर का सर्वोत्तम इस्तेमाल कर सकें।
पोर्टेबल एमपी३ प्लेयर ख़रीदने से पहले निम्न बातों का ध्यान रखें-
  • आईपॉड नाम सबको ललचाता है। परंतु उससे बेहतर ख़रीद एक दो नहीं, कई कई हैं।
  • एमपी३ प्लेयर ऐसा ख़रीदें जिसमें बैटरी इनबिल्ट न हो। इनबिल्ट बैटरी युक्त प्लेयर में हो सकता है कि आप कोई बढ़िया-सी ग़ज़ल सुन रहे हों और उसके दूसरे शेर में बैटरी ख़त्म हो जाए और आस-पास उसे चार्ज करने का साधन भी न हो। बदली जा सकने वाली बैटरी युक्त सेट में कम से कम आप पाँच रुपए की बैटरी पास के पान दुकान या ड्रगस्टोर से ख़रीद कर काम तो चला ही सकते हैं। साथ ही, कोई भी रीचार्जेबल बैटरी अनंत काल तक रिचार्ज कर इस्तेमाल में नहीं ली जा सकती। अंतत: रीचार्जेबल बैटरी का भी नया सेट लेना ही पड़ता है।
  • हार्डडिस्क युक्त एमपी३ प्लेयर कतई नहीं ख़रीदें। साल भर के भीतर ही फ्लैश मेमोरी कार्ड ३२ गी.बातक की क्षमता में मिलने लगेगा और सस्ता ही मिलने लगेगा। अभी ही १-२ गीबाय़ुक्त मेमोरी, फ्लैश कार्ड हज़ार-पंद्रह सौ रुपए में मिलने लगे हैं। मशीनी घूमने वाले उपकरणों युक्त हार्डडिस्क में घर्षण व क्षरण से अंतत: ख़राबी उत्पन्न होती ही है, जबकि स्टैटिक फ्लैश कार्ड मेमोरी में ख़राबी की संभावना तुलनात्मक रूप से अत्यंत कम होती है। ये कम बैटरी भी खाते हैं।
  • एमपी३ प्लेयर ऐसा ख़रीदें जिसमें अलग से या अतिरिक्त मेमोरी कार्ड डाली जा सकती हो। इससे आप अपनी मर्ज़ी के गानों युक्त दो-चार मेमोरी कार्ड भी साथ रख सकते हैं और इस तरह से आपके एमपी३ प्लेयर की मेमोरी कभी भी फुल नहीं होगी। साथ ही आपके पास विकल्प रहेगा कि आने वाले वर्षों में अधिक क्षमता युक्त तुलनात्मक रूप से सस्ते मेमोरी कार्ड के ज़रिए अपने पोर्टेबल संगीत भंडार को और विशाल बना सकें। आजकल ५००-६०० रुपयों में बिना मेमोरी कार्ड युक्त पोर्टेबल पर्सनल एमपी३ प्लेयर बिक रहे हैं। अगर इनके ऑडियोफ़ाइल पर ज़्यादा ज़ोर न दें तो यह सर्वोत्तम ख़रीद होगी।
  • नए पोर्टेबल एमपी३ प्लेयर में वीडियो प्लेबैक की भी सुविधा मिल रही है और अंतर्निर्मित छोटे से वीडियो स्क्रीन के ज़रिए रंगीन वीडियो का भी आनंद लिया जा सकता है। ऐसा प्लेयर बेहतर तब होता है जब उसमें अंतर्निर्मित स्पीकर भी हो तथा टीवी आउट का भी फंक्शन हो।
  • अगर आप व्यावसायिक या अपने पेशे के कारण आमतौर पर दौरे पर रहते हैं तो अच्छा यह होगा कि आप ऐसा एमपी३ प्लेयर पसंद करें जो कि आपके मोबाइल फ़ोन में अंतर्निर्मित हो। अनावश्यक रूप से एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक गजेट लेकर घूमना तो मूर्खता है। परंतु ध्यान रहे कि एमपी३ युक्त मोबाइल फ़ोन में अतिरिक्त फ्लैश मेमोरी कार्ड जोड़ने की सुविधा हो, अन्यथा स्थिर मेमोरी युक्त पोर्टेबल एमपी३ प्लेयर तो एक तरह से बेकार ही होता है।
  • इयरबड वाले इयरफ़ोन जो अकसर एमपी३ प्लेयर के साथ आते हैं, हो सकता है कि वे आपके कानों के आकार के अनुरूप न हों। इससे हो सकता है कि आपके कानों में दर्द या इन्फैक्शन की समस्या पैदा हो जाए। इसलिए बेहतर यह होगा कि अपने कान के लिए योग्य आकार वाले उच्च गुणवत्ता के इयरफ़ोन ख़रीदें। जहाँ तक संभव हो बड़े कान को ढँकने वाले इयरफ़ोन प्रयोग करें। इनसे बाहरी शोर से भी एक हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।
  • अगर आपके पास कार है और उसमें पहले से ही म्यूज़िक सिस्टम लगा है जिसमें एफएम रेडियो भी है, तो ऐसा पोर्टेबल एमपी३ प्लेयर ख़रीदें जिसमें स्टीरियो एफएम ट्रांस्मीशन की भी सुविधा हो। इससे आप अपने पोर्टेबल एमपी३ प्लेयर के ज़रिए बजाए जा रहे संगीत को बिना किसी तार के अपने कार के म्यूज़िक सिस्टम में भी सुन सकते हैं।
  • अब अंतत: आपने अपने लिए कोई बढ़िया, धाँसू पोर्टेबल, पर्सनल एमपी३ पसंद कर ही लिया। आपके पास एमपी३ प्लेयर ख़रीदने का जो बजट अभी है, उसे दो बराबर हिस्से में बाँटें। इसके आधे हिस्से से अभी कोई दूसरा सस्ता-सा पोर्टेबल पर्सनल एमपी३ प्लेयर ख़रीदें। बाकी बचे दूसरे आधे हिस्से से दो साल बाद आप जैसा धाँसू प्लेयर ख़रीदना चाह रहे थे, उससे दस गुना ज़्यादा क्षमता और ख़ासियत वाला प्लेयर ख़रीदें।
  • और अगर आपने अपना पसंदीदा पोर्टेबल एमपी३ प्लेयर ख़रीद ही लिया है तो इसका बेहतर और सर्वोत्तम इस्तेमाल के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें-
  • एमपी३ फॉर्मेट में गानों के डाटा को संपीडित किया जाता है जिसके कारण उसमें सुनने में ऑडियो सीडी जैसी गुणवत्ता नहीं आ पाती। अत: घर पर जहाँ अन्य सुविधाएँ उपलब्ध हों, ऑडियोफ़ाइल ग्रेड सीडीप्लेयरों युक्त म्यूज़िक सिस्टम से गीत संगीत सुनने का आनंद अलग ही होता है।
  • एमपी३ फॉर्मेट में गानों को अलग-अलग बिटरेट पर संपीड़ित किया जाता है। न्यूनतम ३२ केबीप्रसे (KBPS) से लेकर ३२० केबीप्रसे तक संपीडन आमतौर पर प्रचलित है। वैसे सामान्य रूप में उपलब्ध एमपी३ फॉर्मेट में संगीत प्राय: १२८ केबीप्रसे पर एनकोडिंग किया हुआ होता है। ३२ केबीप्रसे से एनकोडित फ़ाइल के संगीत की गुणवत्ता न्यूनतम होती है, वहीं ३२० केबीप्रसे से एनकोडित फ़ाइल में उच्च गुणवत्ता का संगीत मिलता है। अत: यदि आप चाहते हैं कि संगीत की गुणवत्ता में कोई समझौता न हो तो उच्च बिटरेट वाली एमपी३ फ़ाइलें इस्तेमाल करें। वैसे, वेरिएबल बिटरेट भी कुछ मामलों में बेहतर होता है।
  • अगर आप लंबे समय के लिए बाहर जा रहे हैं और चाहते हैं कि आपके पोर्टेबल एमपी३ प्लेयर (या फ्लैश मेमोरी कार्ड) में ज़्यादा से ज़्यादा संगीत आए तो आप अपने संगीत फ़ाइलों को न्यूनतम बिटरेट पर एनकोडिंग करें। यह भी देखें कि क्या आपका एमपी३ प्लेयर डब्ल्यूएमए फॉर्मेट को समर्थित करता है। अगर आपका प्लेयर डब्ल्यूएमए फॉर्मेट को समर्थित करता है तो आप डीबीपावरएंप के ज़रिए १२८ केबीप्रसे से एनकोडित अपने एमपी३ संगीत फ़ाइलों को २० केबीप्रसे युक्त डब्ल्यूएमए फॉर्मेट में एनकोडिंग कर रूपांतरित करें। इस तरह से सामान्य १२८ केबी मेमोरी युक्त एमपी३ प्लेयर में जहाँ २० से २५ एमपी३ गाने ही आ पाते हैं, आप १२५ से अधिक गाने भर सकते हैं। १२८ केबीपीएस वाला ५ मिनट का एमपी३ संगीत फ़ाइल लगभग ५ मेबाका होता है वहीं २० केबीपीएस का डब्ल्यूएमए संगीत फ़ाइल ०६ मेबाज़गह घेरता है। ठीक है, कम केबीपीएस एनकोडिंग से गुणवत्ता में थोड़ी-सी कमी आएगी, परंतु जब आप सफ़र पर हों, गाड़ी घोड़ों की आवाज़ें हों, तो वैसे भी संगीत सुनने में इतनी गुणवत्ता में कमी कोई ख़ास तौर पर नज़र नहीं आती। डीबीपावरएंप से संगीत को कम बिटरेट पर रूपांतरित करना अत्यंत आसान है। डीबीपावरएंप अपने कंप्यूटर पर संस्थापित करिए, तमाम आवश्यक एनकोडिंग इसकी साइट से उतार कर संस्थापित करिए, फिर किसी भी संगीत फ़ाइल को दायाँ क्लिक करिए। संगीत फ़ाइल को रूपांतरित करने के लिए पूछा जाएगा। हाँ करिए और वांछित जानकारी भरिए। बस हो गया।
  • कम बिट रेट से सहेजे गए संगीत फ़ाइलों को बजाने में आपके एमपी३ प्लेयर को कम ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। अत: यह ज़्यादा देर तक और ज़्यादा संगीत फ़ाइलों उतनी ही बैटरी में बजा सकता है। इसीलिए जब आप सफ़र पर हों तो कम बिटरेट वाली संगीत फ़ाइलें ही लोड कर साथ ले जाएँ। और जैसा कि ऊपर के अनुच्छेद में बताया गया है, कम बिटरेट वाली फाइलें कम जगह घेरती हैं, दुहरा फ़ायदा - यानी आपके एमपी३ प्लेयर में ज़्यादा गाने समाएँगे।
हो सकता है कि आपके मन में कोई शंका अब भी हो। हो सकता है कि आपके पास इनसे भी बढ़िया टिप्स, नुस्खे और युक्तियाँ हों। तो, उन्हें हमारे साथ यहाँ अवश्य साझा करें।

हिंदी टूलबार


 इंटरनेट पर हिंदी में लिखने और पढ़ने वालों के लिये बहुत ही काम का टूल है। इसमें आपको हिंदी की सभी साइट्स के लिंक मिलते है इसके अलावा चिट्ठा-खोज, हिंदी लिखने में सहायता, एक क्लिक पर नारद, परिचर्चा और चिट्ठा-चर्चा, सभी हिंदी पत्रिकाओं के लिंक, सभी हिंदी के लिंक, एग्रीगेटरों के लिंक, क्रिकेट का स्कोर-कार्ड, ऑनलाइन रेडियो, पॉप अप ब्लॉकर, ईमेल नोटिफायर, गूगल समाचार और नारद के आर एस एस लाइव फ़ीड, गूगल पेज रेंक, बुक-मार्क करने की सुविधा, कुछ चिट्ठों के लिंक, बहुत से गजेट्स जैसे कि आपके शहर का मौसम और लाइव टीवी भी शामिल हैं। अभी तक इस टूलबार की एक हजार से भी अधिक प्रतियां डाउनलोड हो चुकी हैं। आइए इस टूलबार के बारे में विस्तार से जानते हैं।
  • सर्च : इसमें सामान्य गूगल सर्च के अतिरिक्त छवि, समाचार, स्टॉक और मौसम की खोज तो है ही, चिट्ठा-खोज में आप सभी एग्रीगेटरों से भी सीधे सर्च कर सकते हैं। यानी जो कुछ भी आप चिट्ठा-खोज पर सर्च करते हैं वह केवल नारद, हिंदी-ब्लॉग्स, चिट्ठा-जगत और ब्लॉग-वाणी से सर्च होगा।
  • हिंदी लिखें: इस बटन में कुशिनारा टूल का लिंक दिया गया है। इसे क्लिक करते ही आप जिस भी साइट या चिट्ठे पर हों, आप वहाँ हिंदी में लिख पाएँगे बिना किसी अन्य सॉफ्टवेयर की सहायता के। यानी अगर आपने अपने कंप्यूटर पर हिंदी लिखने का अलग से कोई सॉफ्टवेयर नहीं स्थापित किया है तो भी आप हिंदी लिख पाएँगे। इस टूल में आप फोनेटिक हिंदी लिख सकते हैं यानी यदि आपको ’भारत’ लिखना है तो आप ’bharat’ ही टाइप करेंगे।
  • परिचर्चा, नारद तथा चिट्ठा-चर्चा: एक क्लिक पर आप इन साइट्स पर जा सकतेहैं।
  • पत्रिकाएँ : इस ड्रॉप डाउन मेनू में नेट पर हिंदी की २५ पत्रिकाओं के लिंक हैं। यानी यदि आप हिंदी पत्रिकाएँ पढ़ने के शौकीन हैं तो न तो लिंक के पते याद रखने का झंझट और न ही बुक-मार्क करने की जरूरत।
  • काम के लिंक : इसमें आपको मिलेंगे बहुत से काम के लिंक। सबसे पहले समाचार में हिंदी की सभी समाचारों कि साइट्स के लिंक हैं। इसके बाद हिंदी के शब्द कोश, फिर हिंदी के सर्च इंजन, इसके बाद हिंदी लिखने के सभी ऑनलाईन और ऑफ्लाइन टूल्स, गूगल और याहू समूह के लिंक और बहुत से अन्य काम के लिंक हैं।
  • एग्रीगेटर: हिंदी के सभी एग्रीगेटरों के लिंक इस मेनू में हैं। जितने भी और नये एग्रीगेटर आयेंगे उनके लिंक यहाँ जोड़े जायेंगे।
  • रेडियो : यह यंत्र इस टूलबार की खास विशेषता है। टूलबार में जुड़े इस रेडियो में पचास से अधिक हिंदी संगीत के रेडियो जो कि नेट पर उपलब्ध हैं, जोड़े गये हैं। इनमें आल इंडिया रेडियो से प्रसारित दैनिक दोपहर समाचार जो कि आधे घंटे का समाचार का कार्यक्रम है वह भी जुड़ा है और इसके साथ साथ आकाशवाणी के हर घंटे प्रसारित होने वाले पांच मिनट के हिंदी समाचार बुलेटिन भी अपने आप हर एक घंटे में अपडेट होते हैं। आप चाहें तो आप अपने लाइव स्ट्रीम भी इसमें जोड़ सकते हैं। इस सब के अलावा इस रेडियो प्लेयर की एक खूबी यह भी है कि आप इस पर अपनी हार्ड डिस्क पर सुरक्षित संगीत भी सुन सकते है यानी इंटरनेट पर सर्फ़ करते करते संगीत सुनने के लिये आपको अलग से मीडिया प्लेयर या और कोई ऐसा कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता नहीं है।
  • ईमेल नोटिफ़ायर : आप इसमें अपने ईमेल अकाउंट को सेट कर सकते हैं। आप इसमें हॉटमेल, याहू, जी मेल तथा कोई भी पीओपी (POP) अकाउंट सेट कर सकते हैं। नई मेल आने पर यह नोटिफायर आवाज़ के साथ आपको सूचित करता है।
  • पॉप अप ब्लॉकर : किसी भी साइट पर तंग करने वाले पॉप अप रोकने के लिये।
  • समाचार फ़ीड : गूगल समाचार की आर एस एस फ़ीड जिसमें आप पचास ताजा समाचारों के शीर्षक देख सकते हैं।
  • क्रिकेट स्कोर कार्ड : इसमें जुड़ा है लाइव क्रिकेट स्कोर कार्ड। इस स्कोर कार्ड पर अपने आप अपडेट होने वाला स्कोर कार्ड है जो विश्व में कही भी हो रहे क्रिकेट मैच का लाइव स्कोर देता है। इस छोटे से विजेट को आप स्क्रीन पर कहीं भी लेजा सकते हैं।
  • चिट्ठों की फ़ीड: यदि आपको बार बार नारद पर झाँकने की आदत है तो आपके बहुत काम का बटन है। इसमें चिट्ठों की ताजा फ़ीड अपने आप अपडेट होती रहती है।
  • चिट्ठों की सूची: हिंदी के कुछ अच्छे चिट्ठों की सूची जहां आप सीधे क्लिक करके इन में से किसी भी चिट्ठे पर पहुंच सकते हैं।
  • संदेश : यहाँ आपको टूलबार में हुए ताजा परिवर्तनों के बारे में सूचित किया जायेगा। यह संदेश दोनों तरफ से काम करते हैं अर्थात यदि आप भी कोई सुझाव देना चाहते हैं, टूलबार में कोई समस्या आ रही है अथवा आप टूलबार के प्रयोगकर्ताओं को कोई संदेश देना चाहते हैं तो आप भी यहाँ संदेश भेज सकते हैं।
  • खेल : यहाँ आप कभी कभी छोटे छोटे गेम खेल सकते हैं।
  • मौसम : आपके शहर का लाइव मौसम तथा आने वाले दिनों के लिये मौसम की भविष्यवाणी यहाँ है।
  • गूगल पेज रैंक : यहाँ आप जिस साइट पर जा रहे हैं उसका गूगल पेज रैंक भी देख सकते हैं।
  • इसके अलावा आप इसमें और भी कई उपकरण जोड़ सकते हैं जिनमें प्रमुख है लाइव टीवी।
आपको इस बात का भी नियंत्रण होगा कि आप इस टूलबार में कौन सा कंपोनेंट रखना चाहते हैं तथा कौन सा कंपोनेंट हटाना चाहते हैं। 
हिंदी टूलबार को यहाँ से डाउनलोड किया जा सकता है। 
यदि आप इस टूलबार के लिये कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है।

भोलाराम का जीव


ऐसा कभी नहीं हुआ था। धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफ़ारिश के आधार पर स्वर्ग या नरक में निवास-स्थान ‘अलॉट' करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था। सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी। आखिर उन्होंने खीझ कर रजिस्टर इतने जोर से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई। उसे निकालते हुए वे बोले - "महाराज, रिकार्ड सब ठीक है।

दो बैलों की कथा


जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता हैं । हम जब किसी आदमी को पल्ले दरजे का बेवकूफ कहना चाहता हैं तो उसे गधा कहते हैं । गधा सचमुच बेवकूफ हैं, या उसके सीधेपन, उसकी मिरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी हैं, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता । गायें सींग मारती हैं, ब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती हैं । कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर हैं, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ जाता हैं, किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना । जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दुखायी देरी । वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो, पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा । उसके चहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता हैं । सुख-दुःख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में बदलते नहीं देखा । ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गये है, पर आदमी उसे बेवकूफ कहता हैं । सद् गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा । कदाचित् सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं हैं । देखिये न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्यों दुर्दशा हो रही हैं। क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता ? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं । कहा जाता हैं, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं । अगर वे ईट का जवाब पत्थर से देना सीश जाते तो शायद सभ्य कहलाते लगते । जापान की मिशाल सामने हैं । एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया ।

लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी हैं, जो उससे कम गधा हैं और वह हैं बैल । जिस अर्थ में हम गधा का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में 'बछिया के ताउ' का भी प्रयोग करते हैं । कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे, मगर हमारा विचार ऐसा नहीं हैं । बैल कभी-कभी मारता भी हैं और कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता हैं । और भी कई रीतिओं से अपना असंतोष प्रकट कर देता हैं, अतएव उसका स्थान गधे से नीचा हैं ।

झूरी काछी के दोनो बैलों के बैलों के नाम थे हीरा और मोती । दोनों पछाई जाति के थे -- देखने में सुन्दर, काम में चौकस, डील में ऊँचे । बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया । दोनो आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे । एक-दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाते थे, हम नहीं कह सकते । अवश्य ही उनमे कोई ऐसी गुप्त शक्ति था, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करनेवाला मनुष्य वंचित हैं । दोनों एक दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी सींग भी मिला लिया करते थे -- विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता हैं । इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफसी, कुछ हल्की-सी रहती हैं, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता । जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिये जाते और गरदन हिला-हिलाकर चलते, उस वक्त हर एक की यही चेष्ठा होती थी कि ज्यादा से ज्यादा बोझ मेरी ही गरदन पर रहे । दिनभर के बाद या संध्या को दोनों खुलते तो एक दुसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लिया करते । नाँद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ ही उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे । एक मूँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता ।
सं योग की बात, झूरी ने एक बार गोई को सुसराल भेज दिया । बैलों को क्या मालूम क्यों भेजे जा रहे हैं । समझे, मालिक ने हमे बेच दिया । अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने , पर झूरी के साले गया को घर तक ले जाने में दाँतों में पसीना आ गया । पीछे से हाँकता तो दोनों दायें-बायें भागते, पगहिया पकड़कर आगे से खींचता, तो दोनो पीछे को जोर लगाते । मारते तो दोनों सींग नीचे करके हुँकारते । अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते -- तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो ? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी । अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था और काम ले लेते । हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था । हमने कभी दाने-चारे की शिकाय नही की । तुमने जो कुछ खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर भी तुमने हमें उस जालिम के हाथ क्यों बेच दिया ?
संध्या समय दोनों बैल अपने नये स्थान पर पहुँचे । दिन-भर के भूखे थे, लेकिन जब नाँद में लगाये गये, तो एक ने भी उसने मुँह न डाला । दिल-भारी हो रहा था । जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था । यह नया घर, नया गाँव, नये आदमी, उन्हें बेगानों से लगते थे ।
दोनों ने अपनी मूक-भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गये । जब गाँव में सोता पड़ गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे तुड़ा डाले औऱ घर की तगफ चले । पगहे मजबूत थे । अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगा; पर इन दोनों में इस समय दूना शक्ति आ गयी थी । एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गयी ।
झूरी प्रातःकाल सोकर उठा, तो देखा दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं । दोनों की गरदनों में आधा-आधा गराँव लटक रहा हैं । घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा हैं ।
झूरी बैलों के देखकर स्नेह से गदगद् हो गया । दौड़कर उन्हे गले लगा लिया । प्रेमालिंगन और चुम्बन का नह दृश्य बड़ा मनोहर था ।
घर और गाँव के लड़के जमा हो गये और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे । गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी । बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशू-वीरों को अभिनन्दन पत्र देना चाहिए । कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड़ , कोई चोकर , कोई भूसी ।
एक बालक ने कहा -- ऐसे बैल किसी के पास न होंगे । दूसरे ने समर्थन किया -- इतनी दूर से दोनों अकेले चले आये । तीसरा बोला -- बैल नही हैं वे, उस जनम के आदमी हैं । इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस नहीं हुआ ।
झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा तो जल उठी । बोली -- कैसे नमकहराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया , भाग खड़े हुए ।
झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका -- नमकहराम क्यों हैं? चारा-दाना न दिया होगा, तो क्या करते ?
स्त्री रोब के साथ कहा -- बस, तुम्हीं ही तो बैलों को खिलाना जानते हो और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते है ।
झूरी ने चिढ़ाया -- चारा मिलता तो क्यों भागचे ?
स्त्री चिढ़ी -- भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुद्धुओं की तरह बैलों के सहलाते नहीं । खिलाते है तो रगड़कर जोतते भी हैं । ये ठहरे काम-चोर, भाग निकले, अब देखूँ ? कहाँ से खली और चोकर मिलता हैं । सूखे-भूसे के सिवा कुछ न दूँगी , खाये चाहे मरे ।
वही हुआ। मजूर को बड़ी ताकीद कर दी गयी कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाय ।
बैलों ने नाँद मे मुँह डाला, तो फीका-फीका । न कोई चिकनाहट, न कोई रस । क्या खायँ ? आशा भरी आँखों से द्वार की ओर ताकने लगे ।
झूरी ने मजूर सा कहा -- थोड़ी सी खली क्यों नहीं ड़ाल देता बे ? 'मालकिन मुझे मार डालेगी।' 'चुराकर डाल आ।' 'ना दादा, पीछे से तुम ही उन्हीं की-सी कहोगे ।'


दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला । अबकी बार उसने दोनों को गाड़ी मे जोता ।
दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा ; पर हीरा ने सँभाल लिया । वह ज्यादा सहनशील था ।
संध्या-समय घर पुहँचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मजा चखाया . फिर वही सूखा भूसा डाल दिया । अपने दोनों बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी ।
दोनों बैलो का ऐसा अपमान कभी न हुआ था । झूरी इन्हें फूल की छड़ी से भी न छूता था । उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे । यहाँ मार पड़ी । आहत-सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा ।
दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता , पर इन दोनों ने जैसे पाँव उठाने की कसम खा ली थी । वह मारते मारते थक गया, पर दोनों ने पाँव न उठाया । एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाये, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया । हल लेकर भागा, हल रस्सी, जूआ सब टूट-टाट कर बराबर हो गया । गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होती, तो दोनो पकड़ाई में न आते ।
हीरा ने मूक-भाषा में कहा - भागना व्यर्थ हैं । मोती ने उत्तर दिया -- तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी ।
'अबकी बार बड़ी मार पड़ेगी ।'
'पड़ने दो, बैल का जन्म लिया हैं तो मार से कहाँ तक बचेंगे?'
'गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा हैं। दोनों के हाथ में लाठियाँ हैं ।'
मोती बोला -- कहो तो दिखा दूँ कुछ मजा मैं भी । लाठी लेकर आ रहा हैं ।
हीरा ने समझाया -- नहीं भाई ! खड़े हो जाओ ।
'मुझे मारेगा तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगी ।'
'नहीं । हमारी जाति का यह धर्म नहीं हैं'
मोती दिल में ऐंठकर रह गया । गया आ पहुँचा और दोनो को पकड़कर ले गया । कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती भी पलट पड़ता । उसके तेवर देख कर गया और उसके सहायक समझ गये कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत हैं ।
आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया । दोनों चुपचाप खड़े रहे। धर के लोग भोजन करने लगे । उस वक्त छोटी-सी लड़की दो रोटियाँ लिये निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गयी । उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शान्त होती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया । यहाँ भी किसी सज्जन का वास हैं । लड़की भैरो की थी । उसकी माँ मर चुकी थी । सौतेली माँ उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गयी थी ।
दोनों दिन-भर जोते जाते, डंडे खाते, अड़ते । शाम को थान में बाँध दिये जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती । प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते, मगर दोनों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था ।
एक दिन मोती ने मुक-भाषा में कहा -- अब तो नहीं सहा जाता, हीरा ।
'क्या करना चाहते हो ?'
'एकाध को सींगो पर उठाकर फेंक दूँगा ।'
'लेकिन जानते हो, वह प्यारी लड़की, जो हमे रोटियाँ हैं, उसी की लड़की हैं, जो घर का मालिक है । यह बेचारी अनाथ हो जायगी?'
'मालकिन को न फेंक दूँ । वही तो उस लड़की मारती हैं।'
'लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो ।'
'तुम तो किसी तरह निकलने नही देते हो । बताओ, तुड़ा कर भाग चले ।'
'हाँ, यह मैं स्वीकार करता, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे ?'
'इसका एक उपाय हैं। पहले रस्सी को थोड़ा सा चबा दो । फिर एक झटके में जाती हैं। '
रात को जब बालिका रोटियाँ खिलाकर चली गयी, दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर रस्सी मुँह में न आती थी । बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे ।
सहसा घर का द्वार खुला और वही लड़की निकली । दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे । दोनों की पूँछे खड़ी हों गयी । उसने उनके माथे सहलाये और बोली -- खोले देती हूँ । चुपके से भाग जाओ , नहीं तो यहाँ के लोग मार डालेंगे । आज ही घर में सलाह हो रही हैं कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जायँ ।
उसने गराँव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खड़े रहे । मोती ने अपनी भाषा में पूछा -- अब चलते क्यों नही। हीरा ने कहा -- चलें तो लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आयेगी । सब इसी पर संदेह करेंगे । सहसा बालिका चिल्लायी -- दोनों फूफावाले बैल भागे जा रहे हैं । ओ दादा ! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौड़ो ।
गया हड़बड़ाकर बाहर निकला और बैलों को पकड़ने चला । वे दोनों भागे । गया ने पीछा किया । और भी तेज हुए । गया ने शोर मचाया । फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा । दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया । सीधे दौड़ते चले गये । यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा । जिस परिचित मार्ग से आये थे, उसका यहाँ पता न था । नये-नये गाँव मिलने लगे । तब दोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगे , अब क्या करना चाहिए ।
हीरा ने कहा -- मालूम होता हैं, राह भूल गये ।
'तुम भी तो बेताहाशा भागे । वहीं मार गिराना था।'
'उसे मार गिराते तो, दुनिया क्या कहती? वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़े ?'
दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे । खेत में मटर खड़ी थी । चरने लगे । रह-रहकर आहट ले लेते थे, कोई आता जाता तो नहीं हैं ।
जब पेट भर गया, दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे । पहले दोनों ने डकार ली । फिर सींग मिलाये और एक दूसरे को ठेलने लगे । मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दिया, यहाँ तक कि वह खाई में गिर गया । तब उसे भी क्रोध आया । सभलकर उठा और फिर मोती से मिल गया । मोती ने देखा -- खेल में झगड़ा हुआ चाहता हैं तो किनारे हट गया ।


अरे ! यह क्या ? कौई साँड़ डौकता चला आ रहा हैं । हाँ, साँड ही हैं । वह सामने आ पहुँचा । दोनो मित्र बगलें झाँक रहे हैं । साँड पूरा हाथी हैं । उससे भिडना जान से हाथ धोना हैं , लेकिन न भिडने पर भी जान बचती नहीं नजर आती । इन्हीं की तरफ आ भी रहा हैं । कितनी भयंकर सूरत हैं ।
मोती ने मूक भाषा में कहा -- बुरे फँसे । जान बचेगी ? कोई उपाय सोचो।
हीरा मे चिन्तित स्वर में कहा -- अपने घमंड में भूला हुआ हैं । आरजू-विनती न सुनेगा ।
'भाग क्यों न चले?'
'भागना कायरता हैं ।'
'तो फिर यहीं मरो । बन्दा तो नौ-दो-ग्यारह होता हैं ।'
'और जो दौड़ाये ?'
'तो फिर कोई उपाय सोचो जल्द ।'
'उपाय यही हैं कि उस पर दोनो जने एक साथ चोट करे ? मै आगे से रगेदता हूँ तुम पीछे से रगेदो , दोहरी मार पड़ेगी तो भाग खड़ा होगा । मेरी ओर झपटे, तुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड देना । जान जोशिम हैं , पर दूसरा उपाय नहीं है ।'
दोनों मित्र जान हथेली पर लेकर लपके । साँड को भी संगठित शत्रुओ से लडने का तजरबा न था । वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था । ज्योही हीरा पर झपटा , मोती ने पीछे से दौड़ाया । साँड उसकी तरउ मुडा, तो हीरा ने रगेदा । साँड चाहता थि कि एक एक करके दोनो को गिरा ले, पर ये दोनो भी उस्ताद थे । उसे अवसर न देते थे । एक बार साँड झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने ले लिए चला कि मोती ने बगल से आकर पेट मे सींग भोक दी । साँड क्रोध मे आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींग चुभा दिया । आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा और दोनो मित्रो ने दूर तक उसका पीछा किया । यहाँ तक की साँड बेदम होकर गिर पड़ा । तब दोनो ने उसे छोड़ दिया ।
दोनो मित्र विजय के नशे में झूमते चले जाते थे ।
मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा मे कहा -- मेरा जी तो चाहता था कि बच्चा को मार ही डालूँ ।
हीरा ने तिरस्कार किया -- गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिये ।
'यह सब ढोग हैं । बैरी को ऐसा मारना चाहिये कि फिर न उठे ।'
'अब घर कैसे पहुँचेंगे , वह सोचो ।'
'पहले कुछ खा ले, तो सोचे ।'
सामने मटर का खेत था ही । मोती उसमे घुस गया । हीरा मना करता रहा, पर उसने एक न सुनी । अभी चार ही ग्रास खाये थे दो आदमी लाठियाँ लिये दौड़ पडे , और दोनो मित्रो के घेर लिया । हीरा तो मेड पर था , निकल गया । मोती सीचे हुए खेत मे था । उसके खुर कीचड़ मे धँसने लगे । न भाग सका । पकड़ लिया । हीरा ने देखा , संगी संकट मे हैं , तो लौट पड़ा फँसेगे तो दोनो फँसेगे । रखवालो ने उसे भी पकड़ लिया ।
प्रातःकाल दोनो काँजीहौस में बन्द कर दिये गये ।


दोनो मित्रो को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला । समझ ही में न आता था , यह कैसा स्वामी हैं । इससे तो गया फिर भी अच्छा था । यहाँ कई भैसे थी, बकरियाँ , कई घोड़े, कई गधे; पर किसी से सामने चारा न था , सब जमीन पर मुरदो की करह पड़े थे । कई तो इतने कमजार हो गये थे कि खड़े भी न हो सकते थे । सारा दिन दोनो मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाये ताकते रहे, पर कोई चारा लेकर न आता न दिखायी दिया । तब दोनो ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरु की, पर इससे क्या तृप्ति होती ?
रात को भी जब कुछ भोजन न मिला तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला -- अब तो नही रहा जाता मोती !
मोती ने सिर लटकाये हुए जवाब दिया -- मुझे तो मालूम होतो हैं प्राण निकल रहे हैं ।
'इतनी जल्दी हिम्मत न हारो भाई ! यहाँ से भागने का कोई उपाय निकलना चाहिये ।'
'आओ दीवार तोड डालें।'
'मुझसे तो अब कुछ नही होगा ।'
'बस इसी बूते अकड़ते थे !'
'सारी अकड़ निकल गयी।'
बाडे की दीवार कच्ची थी । हीरा मजबूत तो था ही , अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिये और जोर मारा, तो मिट्टी का एक चिप्पड निकल आया । फिर तो उसका साहस बढा । इसने दौड-दौडकर दीवार पर कई चोटे की और हर चोट मे थोडी थोड़ी मिट्टी गिराने लगा।
उसी समय काँजीहौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरो की हाजिरी लेने आ निकला । हीरा का उजड्डपन देखकर उसने उसे कई डंडे रसीद किये और मोटी सी रस्सी से बाँध दिया ।
मोती ने पड़े पड़े कहा -- आखिर मार खायी, क्या मिला ?
'अपने बूते भर जोर तो मार दिया।'
'ऐसा जोर मारना किस काम का कि औप बंधन मे पड़ गये ।'
'जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने वंधन पड़ जाये ।'
'जान से हाथ धोना पड़ेगा ।'
'कुछ परवाह नहीं । यो भी तो मरना ही हैं । सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जाने बच जाती । इतने भाई यहाँ बन्द हैं । किसी के देह में जान नहीं हैं । दो चार दिन और यही हाल रहा तो सब मर जायेगे ।'
'हाँ, यह बात तो हैं। अच्छा, तो लो, फिर में भी जोर लगाता हूँ ।'
मोती ने भी दीवार मे उसी जगह सींग मारा । थोडी सी मिट्टी गिरी और हिम्मत बढी । फिर तो दीवार में सींग लगा कर इस तरह जोर करने लगा , मानो किसी प्रतिद्वन्द्वी से लड रहा हैं । आखिर कोई दो घंटे की जोर आजमाई के बाद , दीवार का ऊपर से एक हाथ गि गयी । उसने दूनी शक्ति से दूसरा घक्का मारा, तो आधी दीवार गिर गयी ।
दीवार का गिरना था कि अधमरे से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे । तीनो घोड़ियाँ सरपट भाग निकली । फिर बकरियाँ निकली । उसके बाद भैंसे भी खिसक गयी ; पर गधे अभी तक ज्यो के त्या खड़े थे ।
हीरा ने पूछा -- तुम दोनो भाग क्यो नहीं जाते ?
एक गधे ने कहा -- जो कही फिर पकड़ लिये जायँ ।
'तो क्या हरज हैं । अभी तो भागने का अवसर हैं ।'
'हमे तो डर लगता हैं। हम यही पड़े रहेंगे ।'
आधी रात से ऊपर जा चुकी थी । दोनो गधे अभी तक खड़े सोच रहे थे कि भागे या न भागे , और मोती अपने मित्र की रस्सी तोड़ने मे लगा हुआ था । जब वह हार गया तो हीरा ने कहा -- तुम जाओ, मुझे यहीं पड़ा रहने दो । शायद कहीम भेट हो जाये ।
मोती ने आँखो मे आँसू लाकर कहा -- सुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हैं हीरा । हम और तुम इतने दिनो एक साथ रहे हैं । आज तुम विपत्ति मे पड़ गये तो मैं तुम्हें छोडकर अलग हो जाऊँ ।
हीरा ने कहा -- बहुत मार पड़ेगी । लोग समझ जायेगे, यह तुम्हारी शरारत हैं ।
मोती गर्व से बोला -- जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बन्धन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े तो क्या चिन्ता । इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियो की जान बच गयी । वे सब तो आशीर्वाद देगे ।
यह कहते हुए मोती ने दोनो गधों को सींगो से मार मारकर बाड़े के बाहर निकाला और तब बन्धु के पास आकर सो रहा ।
भोर होते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मची , इसके लिखने की जरुरत नही । बस, इतना ही काफी हैं कि मोती की खूब मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया ।


एक सप्ताह तक दोनो मित्र वहाँ बँधे रहे । किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला । हाँ, एक बार पानी दिखा दिया जाता था । यहीं उनका आधार था । दोनों इतने दुबले हो गये थे कि उठा तक न जाता था ; ठठरियाँ निकल आयी थी ।
एक दिन बाडे के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते होते वहाँ पचास-साठ आदमी जमा हो गये । तब दोनो मित्र निकाले गये और उनकी देख भाल होने लगी । लोग आ आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते । ऐसे मृतक बैलो का कौन खरीदार होता ?
सहसा एक दढियल आदमी, जिसकी आँखे लाल थी और मुद्रा अत्यन्त कठोर , आया और दोनो मित्रो के कूल्हों में उँगली गोदकर मुंशीजी से बात करने लगा । उसका चेहरा देखकर अन्तर्ज्ञान सं दोनो मित्रों के दिल काँप उठे । वह कौन है और उन्हें क्यो टटोल रहा हैं, इस विषय में उन्हें कोई सन्देह न हुआ । दोनो ने एक दूसरे को भीत नेत्रों स देखा और सिर झुका लिया ।
हीरा ने कहा -- गया के घर से नाहक भागे । अब जान न बचेगी ।
मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया -- कहते हैं, भगवान सबके ऊपर दया करते हैं । उन्हें हमारे ऊपर क्यो दया नही आती?
'भगवान् के लिए हमारा मरना-जीना दोनो बराबर हैं । चलो, अच्छा ही है, कुछ दिन उसके पास तो रहेंगे । एक बार भगवान् ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था क्या अब न बचायेंगे ।'
'यह आदमी छुरी चलायेगा । देख लेना ।'
'तो क्या चिन्ता हैं? माँस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी न किसी काम आ जायेंगी।'
नीलाम हो जाने के बाद दोनो मित्र दढियल के साथ चले । दोनो की बोटी-बोटी काँप रही थी । बेचारे पाँव तक न उठा सकते थे , पर भय के मारे गिरते-पड़ते भागे जाते थे ; क्योकि बह जरा भी चाल धीमी हो जाने पर जोर से डंडा जमा देता था ।
राह में गाय-बैलो का एक रेवड हरे-हरे हार मे चरता नजर आया । सभी जानवर प्रसन्न थे , चिकने , चपल । कोई उछलतास कोई आनन्द से बैठा पागुर करता था । कितना सुखी जीवन था इनका; पर कितने स्वार्थी हैं सब। किसी को चिन्ता नहीं कि उनके दो भाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुःखी है ।
यहसा दोनो को ऐसा मालूम हुआ कि यह परिचित राह हैं । हाँ, इसी रास्ते से गया उन्हे ले गया था । वही खेत, वही बाग, वही गाँव मिलने लगे । सारी थकान, सारी दुर्बलता गायब हो गयी । आह ? यह लो ! अपना ही हार आ गया । इसी कुएँ पर हम पुर चलाने आया करते थे ; यही कुआँ हैं ।
मोती ने कहा -- हमारा घर नगीच आ गया ।
हीरा बोला -- भगवान् की दया हैं ।
'मै तो अब घर भागता हूँ ।'
'यह जाने देगा ?'
'इसे मार गिराता हूँ ।'
'नहीं-नहीं, दौड़कर थान पर चलो। वहाँ से आगे न जायेंगे ।'
दोनो उन्मत होकर बछड़ो की भाँति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े ।
वह हमारा थान हैं । दोनो दौड़कर अपने थान पर आये और खड़े हो गये । दढियल भी पीछे पीछे दौड़ा चला आता था ।
धूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था । बैलों को देखते ही दौडा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे । एक झूरी के हाथ चाट रहा था ।
दढियल ने जाकर बैलो की रस्सी पकड़ ली ।
झूरी ने कहा -- मेरे बैल हैं ।
'तुम्हारे बैल कैसे ? मैं मवेशीखाने से नीलाम लिये आता हूँ ।'
'मैं समझता हूँ कि चुराये लिये आते हो ! चुपके से चले जाओ । मेरे बैल हैे । मैं बेचूँगा तो बिकेंगे । किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख्तियार हैं ?'
'जाकर थाने मे रपट कर दूँगा ।'
'मेरे बैल हैं। इसका सबूत हैं कि मेरे द्वार पर खड़े हैं ।'
दढियल झल्लाकर बैलो को जबरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढा । उसी वक्त मोती ने सींग चलाया । दढियल पीछे हटा । मोती ने पीछा किया । दढियल भागा। मोती पीछे दौड़ा । गाँव के बाहर निकल जाने पर वह रुका ; पर खड़ा दढियल का रास्ता देख रहा था । दढियल दूर खड़ा धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ निकाल रहा था , पत्थर फेंक रहा था । और मोती विजयी शूर की भाँति उसका रास्ता रोके खड़ा था । गाँव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे ।
जब दढियल हारकर चला गया , तो मोती अकड़ता हुआ लौटा ।
हीरा मे कहा -- मैं डर रहा था कि कहीं तुम गुस्से मे आकर मार न बैठो ।
'अगर वह मुझे पकड़ता , तो बे-मारे न छोड़ता ।'
'अब न आयेगा ।'
'आयेगा तो दूर ही से खबर लूँगा । देखूँ कैसे ले जाता हैं ।'
'जो गोली मरवा दे ?'
'मर जाऊँगा ; पर उसके काम तो न आऊँगा ।'
'हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता ।'
'इसीलिए कि हम इतने सीधे हैं ।'
जरा देर मे नादों में खली , भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया और दोनो मित्र खाने लगे । झूरी खड़ा दोनो को सहला रहा था और बीसो लड़के तमाशा देख रहे थे । सारे गाँव में उछाह-सा मालूम होता था ।

उसी समय मालकिन ने आकर दोनो के माथे चूम लिये ।

पूस की रात


हल्कू ने आकर स्त्री से कहा-- सहना आया है । लाओं, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे ।
मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली-तीन ही रुपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहॉँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, फसल पर दे देंगें। अभी नहीं ।
हल्कू एक क्षण अनिशिचत दशा में खड़ा रहा । पूस सिर पर आ गया, कम्बल के बिना हार मे रात को वह किसी तरह सो नहीं सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियॉं देगा। बला से जाड़ों मे मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी । यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिध्द करता था ) स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला-दे दे, गला तो छूटे ।कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगा ।
मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और ऑंखें तरेरती हुई बोली-कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे ? कोई खैरात दे देगा कम्मल ? न जान कितनी बाकी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती । मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करों, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुटटी हुई । बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ हैं । पेट के लिए मजूरी करों । ऐसी खेती से बाज आयें । मैं रुपयें न दूँगी, न दूँगी । हल्कू उदास होकर बोला-तो क्या गाली खाऊँ ? मुन्नी ने तड़पकर कहा-गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है ? मगर यह कहने के साथ् ही उसकी तनी हुई भौहें ढ़ीली पड़ गई । हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भॉँति उसे घूर रहा था । उसने जाकर आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली-तुम छोड़ दो अबकी से खेती । मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी । किसी की धौंस तो न रहेगी । अच्छी खेती है ! मजूरी करके लाओं, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस । हल्कू न रुपयें लिये और इस तरह बाहर चला, मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हों । उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-काटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किए थें । वह आज निकले जा रहे थे । एक-एक पग के साथ उसका मस्तक पानी दीनता के भार से दबा जा रहा था । 
पूस की अँधेरी रात ! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बॉस के खटाले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा कॉप रहा था । खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था । दो मे से एक को भी नींद नहीं आ रही थी । हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा-क्यों जबरा, जाड़ा लगता है ? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहॉँ क्या लेने आये थें ? अब खाओं ठंड, मै क्या करूँ ? जानते थें, मै। यहॉँ हलुआ-पूरी खाने आ रहा हूँ, दोड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये । अब रोओ नानी के नाम को । जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ कहा-कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे । यीह रांड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही हैं । उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ । किसी तरह रात तो कटे ! आठ चिलम तो पी चुका । यह खेती का मजा हैं ! और एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा आए तो गरमी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गददे, लिहाफ, कम्बल । मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाए । जकदीर की खूबी ! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें ! हल्कू उठा, गड्ढ़े मे से जरा-सी आग निकालकर चिलम भरी । जबरा भी उठ बैठा । हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा-पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता हैं, हॉँ जरा, मन बदल जाता है। जबरा ने उनके मुँह की ओर प्रेम से छलकता हुई ऑंखों से देखा । हल्कू-आज और जाड़ा खा ले । कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा । उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा । जबरा ने अपने पंजो उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया । हल्कू को उसकी गर्म सॉस लगी । चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा । कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भॉँति उसकी छाती को दबाए हुए था । जब किसी तर न रहा गया, उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया । कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था । जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न ,थी । अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता । वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा कोपहुंचा दिया । नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था । सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई । इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा कर रही थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी । वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा । हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया । हार मे चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता । कर्त्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था  
एक घंटा और गुजर गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई, ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया हैं, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहीं है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाकी है ! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े । ऊपर आ जाऍंगे तब कहीं सबेरा होगा । अभी पहर से ऊपर रात हैं । हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग था । पतझड़ शुरु हो गई थी । बाग में पत्तियो को ढेर लगा हुआ था । हल्कू ने सोच, चलकर पत्तियों बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ । रात को कोई मुझें पत्तियों बटारते देख तो समझे, कोई भूत है । कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रह जाता । उसने पास के अरहर के खेत मे जाकर कई पौधें उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ चला । जबरा ने उसे आते देखा, पास आया और दुम हिलाने लगा । हल्कू ने कहा-अब तो नहीं रहा जाता जबरू । चलो बगीचे में पत्तियों बटोरकर तापें । टॉटे हो जाऍंगे, तो फिर आकर सोऍंगें । अभी तो बहुत रात है। जबरा ने कूँ-कूँ करें सहमति प्रकट की और आगे बगीचे की ओर चला। बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था । वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं । एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया । हल्कू ने कहा-कैसी अच्छी महक आई जबरू ! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही हैं ? जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गई थी । उसे चिंचोड़ रहा था । हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियों बठारने लगा । जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया था । हाथ ठिठुरे जाते थें । नगें पांव गले जाते थें । और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था । इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा । थोड़ी देर में अलावा जल उठा । उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी । उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थें, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों । अन्धकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था । हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था । एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पॉवं फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में आए सो कर । ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था । उसने जबरा से कहा-क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है ? जब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा-अब क्या ठंड लगती ही रहेगी ? ‘पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खातें ।’ जब्बर ने पूँछ हिलायी । अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें । देखें, कौन निकल जाता है। अगर जल गए बचा, तो मैं दवा न करूँगा । जब्बर ने उस अग्नि-राशि की ओर कातर नेत्रों से देखा ! मुन्नी से कल न कह देना, नहीं लड़ाई करेगी । यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ निकल गया । पैरों में जरा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी । जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ । हल्कू ने कहा-चलो-चलों इसकी सही नहीं ! ऊपर से कूदकर आओ । वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया ।
पत्तियॉँ जल चुकी थीं । बगीचे में फिर अँधेरा छा गया था । राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर ऑंखे बन्द कर लेती थी ! हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा । उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था । जबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुण्ड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुण्ड था । उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी । फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं है। उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी। उसने दिल में कहा-नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहॉँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ! उसने जोर से आवाज लगायी-जबरा, जबरा। जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया। फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दँदाया हुआ बैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला। उसने जोर से आवाज लगायी-हिलो! हिलो! हिलो! जबरा फिर भूँक उठा । जानवर खेत चर रहे थें । फसल तैयार हैं । कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते है। हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम चला, पर एकाएक हवा कस ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा । जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नील गाये खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था । अकर्मण्यता ने रस्सियों की भॉति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था। उसी राख के पस गर्म जमीन परद वही चादर ओढ़ कर सो गया । सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी की रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें ? तुम यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया । हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही है ? मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत कासत्यनाश हो गया । भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ मँड़ैया डालने से क्या हुआ ? हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै नहीं जानता हूँ ! दोनों फिर खेत के डॉँड पर आयें । देखा सारा खेत रौदां पड़ा हुआ है और जबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों । दोनों खेत की दशा देख रहे थें । मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था । मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी। हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा  

ठाकुर का कुआँ

जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई । गंगी से बोला-यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तू सडा पानी पिलाए देती है !
गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी । कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी । जरुर कोई जानवर कुएं में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?
ठाकुर के कुंए पर कौन चढ़नें देगा ? दूर से लोग डॉँट बताऍगे । साहू का कुऑं गॉँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहॉं कौन पानी भरने देगा ? कोई कुऑं गॉँव में नहीं है।
जोखू कई दिन से बीमार हैं । कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता । ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं ।
गंगी ने पानी न दिया । खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं । बोली-यह पानी कैसे पियोंगे ? न जाने कौन जानवर मरा हैं। कुऍ से मै दूसरा पानी लाए देती हूँ।
जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहॉ से लाएगी ?
ठाकुर और साहू के दो कुऍं तो हैं। क्यो एक लोटा पानी न भरन देंगे?
‘हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से । ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें । गराबी का दर्द कौन समझता हैं ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झॉँकनें नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगें ?’
इन शब्दों में कड़वा सत्य था । गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया । 

रात के नौ बजे थे । थके-मॉँदे मजदूर तो सो चुके थें, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पॉँच बेफिक्रे जमा थें मैदान में । बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं । कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थें, नकल नहीं मिल सकती । कोई पचास मॉँगता, कोई सौ। यहॉ बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी । काम करने ढ़ग चाहिए ।
इसी समय गंगी कुऍ से पानी लेने पहुँची ।
कुप्पी की धुँधली रोशनी कुऍं पर आ रही थी । गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी । इस कुँए का पानी सारा गॉंव पीता हैं । किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते ।
गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊचें हैं ? इसलिए किये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहॉ तो जितने है, एक-से-एक छॅटे हैं । चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें । अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया । इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है । काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है । किस-किस बात मे हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे । कभी गॉँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर सॉँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!
कुऍं पर किसी के आने की आहट हुई । गंगी की छाती धक-धक करने लगी । कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े । उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अँधरे साए मे जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी । इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं ?
कुऍं पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी । इनमें बात हो रही थीं ।
‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं । घड़े के लिए पैसे नहीं है।’
हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं ।’
‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।’
‘लौडिंयॉँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौडियॉं कैसी होती हैं!’
‘मत लजाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को ती तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता ! यहॉं काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता ।’
दानों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुऍं की जगत के पास आयी । बेफिक्रे चले गऐ थें । ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर ऑंगन में सोने जा रहे थें । गंगी ने क्षणिक सुख की सॉस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ्-बूझकर न गया हो । गंगी दबे पॉँव कुऍं की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।
उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । दाऍं-बाऍं चौकनी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो । अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं । अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुऍं में डाल दिया ।
घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता । जरा-सी आवाज न हुई । गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे ।घड़ा कुऍं के मुँह तक आ पहुँचा । कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींसच सकता था।
गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखें कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा।
गंगी के हाथ रस्सी छूट गई । रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।
ठाकुर कौन है, कौन है ? पुकारते हुए कुऍं की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।

घर पहुँचकर देखा कि लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी रहा है।

पुष्प की अभिलाषा


चाह नहीं मैं सुरबाला के 
गहनों में गूथा जाऊँ 
चाह नहीं प्रेमी माला में 
बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं सम्राटों के 
शव पर हे हरि डाला जाऊँ 
चाह नहीं देवों के सिर पर 
चढूँ भाग्य पर इतराऊँ

मुझे तोड़ लेना बनमाली 
उस पथ पर तुम देना फेंक 
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने 
जिस पथ जाएँ वीर अनेक

झाँसी की रानी


सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
Twitter Bird Gadget