रविवार, 4 अक्तूबर 2020

नींद में बातें करना बुरी आदत हो सकती है, लेकिन इसी ने मुझे और बुरी आदतों में पड़ने से बचाया

मेरे बचपन का यह किस्सा सत्याग्रह डॉट कॉम पर पब्लिश हुआ है। यहाँ पर जुड़े बहुत से लोग शायद वहाँ इसे ना पढ़ पाएँ हो, इसलिए यहाँ पोस्ट किए दे रहा हूँ। 

सत्याग्रह की लिंक यह है - जब मैं छोटा बच्चा था : लक्ष्मण बिशनोई

बात तब की है, जब मैं छठी-सातवीं कक्षा में पढ़ा करता था. हम लोग शुरू से ही औद्योगिक क्षेत्र में रहे हैं. रीको नाम से राजस्थान सरकार हर जिला मुख्यालय पर एक औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया करती है, जहां कुछ छोटी-मोटी उत्पादन इकाइयां लगी होती है. अमूमन रीको शहर से लगभग दो-तीन किलोमीटर बाहर होता है. नागौर जिले के मुख्यालय के इसी रीको में हमारा घर था. दो मंज़िला मकान में नीचे प्रिंटिंग प्रेस हुआ करती थी और ऊपर के कमरे में हमारा घर.

पापा प्रिंटिंग प्रेस चलाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता भी किया करते थे. उन दिनों उन्होंने जिला स्तर के एक दैनिक अखबार का प्रकाशन शुरू किया था. यह एक सांयकालीन अखबार था. सीमित ग्राहकों तक विस्तार था और खुल्ले में भी बिका करता था. एक रुपये में एक अखबार.

तो उन दिनों मैं सब के मना करने के बावजूद अखबार बेचने शहर जाने लगा. मेरे इसमें दो निजी स्वार्थ थे. एक तो पापा के ऑफिस (शहर) जाने का बहाना मिल जाता, वो भी स्कूटर से. वहीं मैं बीस पच्चीस अखबार बेच देता तो मुझे दो-तीन रुपये खर्च करने को मिल जाया करते थे, यानी कि कमीशन. हफ्ते-दस दिन में जब बीस तीस रुपये जमा हो जाते तो मैं कभी कुछ चटपटा खा लेता या फिर कोई कॉमिक्स खरीद लेता.

इसी सिलसिले के चलते एक दिन इन पैसों को लेकर मेरी नीयत खराब हो गई. दीवाली के दूसरे दिन बड़े दैनिक अख़बारों की छुट्टी हुआ करती है. हमारी प्रिंटिंग प्रेस घर में ही थी और अखबार भी छोटे स्तर का था तो हमारा अखबार उस दिन भी छपता था. बाकी अखबार बंद रहने के कारण उस दिन हमारा अखबार ज्यादा बिक जाया करता था. दीवाली के अगले दिन मैं भी अखबार बेचने निकला. किस्मत से उस दिन अखबार बीस की जगह तीस बिक गये बल्कि तीस से भी ज्यादा शायद छत्तीस के आस-पास. तो अब हुआ यूं कि ये पैसे देखकर मेरा मन खराब हो गया. मैंने छत्तीस में से छह रुपये पैंट की जेब में डाले और तीस रुपये मुट्ठी में दबाकर निकल पड़ा, खर्च करने. एक बार लगा कि गलत कर रहा हूं. शायद मन से आवाज़ आई कि यह गलत है. मैंने धृष्टता की और मन की आवाज को कोने में दबाया और आगे बढ़ गया.

मैं एक बड़ी नमकीन की दुकान पर पहुंचा. यहां मैंने दस रुपये में दही चटनी वाली प्याज की कचौरी खाई, दस रुपये का एक मिर्ची बड़ा खाया. दीवाली का दूसरा दिन था, सर्दी भी आ ही रही थी तो स्टेशन पर गजक और तिल की पपड़ी के ठेले भी लगने शुरू हो गए थे. इस तरह मेरे दस रुपये यहां भी होम हो गए. गजक खाई या तिल पपड़ी, ये ढंग से याद नहीं. ये सब चीज़ें घर पर भी बन जाया करती थीं फिर भी स्टेशन पर खड़े होकर या ऊंची सी दुकान में लगे चमकते से फर्नीचर पर बैठकर खाने का सा मज़ा घर में थोड़े ही आता है. इस तरह मेरे हाथों वो तीस रुपये खर्च हुए. खट्टी-मीठी सी डकार ली, मुंह पोंछा और चल दिए मस्ती से ऑफिस की ओर.

पापा कुछ लिख पढ़ रहे थे. मैंने उन्हें छह रुपये हाथ में दिए और दुखी सी शक्ल बनाते हुए कहा – ‘आज स्टेशन पर बहुत कम लोग थे, पता नहीं चक्कर क्या है.’ बड़ा भाई ऑफिस में बैठा करता था, वो बोला – ‘कल दीवाली थी न, घर पर होंगे लोग. त्यौहार को सब बाहर कहां निकलते हैं. आज तो बहुत सी दुकानें भी बंद रही.’ मैंने भी बुझी-बुझी आवाज़ में कहा – ‘हां, यही लगता है.’ और भाई के पास जाकर कुर्सी पर बैठ गया. कंप्यूटर की स्क्रीन की तरफ झांकने लगा. पापा हमेशा की तरह कुछ नहीं बोले.

घण्टे भर बाद पापा, भाई और मैं – हम तीनों घर आ गए. खाना-वाना खाया. थोड़ी देर में सब लोग सो गए. मैं भी अपनी आज की चालाकी पर मन ही मन खुश होता हुआ अपने बिस्तर में घुस गया.

अब बड़ी गड़बड़ हुई साहब. नींद आसपास भी नहीं फटक रही थी. इंसान दिनभर में मन की बिना सुने जो कुछ करता है, रात को सोते वक्त उसका मन समझाया करता है कि भई, आज ये बड़ी गलती कर दी, सुधर जा! मेरा बालमन भी ऐसा ही कुछ समझा रहा था. मैंने ऐसी गलती पहली बार की थी इसलिए तीस रुपये हज़म नहीं हो पा रहे थे. मैं खुद को दिलासा दे रहा था कि जो भी हो, कचौरी बड़ी मस्त बनी थी, लेकिन मन नहीं माना तो नहीं माना. मन कहता रहा – मैंने गलत किया है और मैं समझाता रहा कि सब सही है. आधे-पौन घण्टे उधेड़बुन चली लेकिन मैंने ढीठ बनते हुए फिर मन को दबाया और सो गया. बड़ी मुश्किल हुई, लेकिन नींद आ गई.

सुबह हुई. मैं देर से उठा करता था. जब उठा तो नीचे के कमरे में आया. पापा-मम्मी, भाई-बहन चारों लोग अखबार पढ़ रहे थे. हरदम भी मैं ऐसे ही आता और भाई या बहन दोनों में से किसी एक से अखबार का एकाध पन्ना छीनकर पढ़ने लगता. आज जैसे ही पास पहुंचा तो पापा चश्मे के ऊपर से मुस्कुराते हुए झांकने लगे. मम्मी भी धीरे-धीरे हंस रही थी. भाई और बहन दोनों ठहाके लगा रहे थे. मुझे कुछ समझ में नहीं आया. मुझे लगा कोई बात चल रही होगी. मैंने बहन के हाथ से अखबार छीनने की कोशिश की तो वो बोली – ‘रुक जा, सुन तो ले पापा क्या कह रहे हैं?’

मैं पापा की तरफ मुड़ा. पापा मुस्कुराए, बोले- ‘कचौरी कौन सी दुकान से खाई थी? पूनम जी वाली दुकान से या बालू जी वाली दुकान से?’

मुझे काटो तो खून नहीं. इन्हें कैसे पता चल गया, किसने बता दिया? किसी ने देख लिया लगता है.

फिर भी, बात संभालनी तो थी ही, बिल्कुल अनजान बनते हुए मैंने कहा कौन-सी कचौरी?

पापा बोले बेटा, तीस रुपये इतनी आसानी से थोड़ी हजम हो जाएंगे. रात को दो बजे तू ही बता रहा था कि अखबार बेचे तो छत्तीस थे, तीस मैं खा गया.

अब जाकर मुझे पूरा माज़रा समझ आया. दरअसल मुझे नींद में बोलने की आदत थी. उस रात सोते वक्त मन में यही सब चल रहा था तो रात को नींद में ही पापा को जगाया और उन्हें सारी बात बता दी थी. और इसके बाद फिर से सो गया. यानी अवचेतन मन वो सब कर गया जो मैं उसे नहीं करने देना चाहता था.

अब पापा बोले जा रहे थे कि बेटा, मन की बात सुन लिया करो. मन जिस काम के लिए मना करे, वो काम मत किया करो... और ऐसी बातें सुनाते हुए वे मुझे समझाइश दे रहे थे. मैं शर्म से पानी-पानी हो रहा था कि सब गड़बड़ हो गई. उस घटना के बाद नींद में उठकर बात करने के डर से फिर मैंने कभी ऐसी गलती नहीं की. लोग कहते हैं कि नींद में बातें करना बुरी आदत है लेकिन अपने लिए मैं इसे अच्छा ही कहूंगा क्योंकि इसी ने मुझे और बुरी आदतों में पड़ने से बचाया है.

लक्ष्मण विश्नोई सत्याग्रह के नियमित पाठक हैं और नागौर (राजस्थान) में रहते हैं.

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

World Cinema : A List of 200 Great Movies on 45 Themes

 साधु संत कह गए हैं कि करन्तीना कर रहे लोगों को मूवीज़ की लिस्ट बना देना पुण्य का काम है। तो 45 के लगभग थीम्स उठाई है और उन पर जो अच्छी फ़िल्म्स देख रखी है, उन्हें लिख दिया है। अभी दो सौ की ही सूची बनाई है। आप भी देखें, शेयर कर के और लोगों तक भी पहुँचाएं और सुकृत कमाएँ।

Dysfunctional family
1. Tokyo story, Japan, 1953
2. Nat samrat, India, 2016
3. A separation, Iran, 2011
4. Shoplifters, Japan, 2018
5. The farewell, USA, 2019
Father/mother & son/daughter bonding
1. Miracle in cell no. 7, South Korea, 2013
2. Pursuit of happyness, USA, 2006
3. Bicycle thieves, Italy, 1948
4. Hope, South Korea, 2013
5. Les miserables, UK, 2012
Human-animal relation
1. Hachiko, Japan, 1987 (Hachi, USA, 2009)
2. Okja, South Korea, 2017
3. Ratatouille, USA, 2007
4. The jungle book, USA, 1967, 2016
5. King Kong, New Zealand, 2005
About faith
1. Ben hurr, USA, 1959
2. The green mile, USA, 1999
3. it’s a wonderful life, USA, 1946
4. The seventh seal, Sweden, 1957
5. The passion of the Christ, USA, 2004
Questioning the faith
1. Faith trilogy, Sweden, 1961-63
2. There will be blood, USA, 2007
3. The man from earth, USA, 2007
4. PK, India, 2014
5. Sita sings the blues, USA, 2008
Time Travel/ space
1. Interstellar, USA, 2014
2. Groundhog day, USA, 1993
3. The Martian, USA, 2015
Trilogy / Tetralogy
1. The apu trilogy, India, 1955-59
2. Lord of the rings trilogy, New Zealand, 2001-03
3. The God father trilogy, USA, 1972, 74, 90
4. The dark knight trilogy, USA, 2005, 08, 12
5. Toy story tetralogy, USA, 1995, 99, 2010, 19
Ancient and medieval times, depicting different civilizations
1. Mughal-e-azam, India, 1960
2. Seven samurai, Japan, 1954
3. Gladiator, USA, 2000
4. Apocalypto, USA, 2006
5. The last of the Mohicans, USA, 1992
Kings and Queens
1. The king’s speech, UK, 2010
2. Cleopatra, USA, 1963
3. The last emperor, UK, 1987
4. Masquerade, South Korea, 2012
5. 300, USA, 2006
National heroes
1. Gandhi, UK, 1982
2. Brave heart, USA, 1995
3. The passion of Joan of arc, France, 1928
4. Lincoln, USA, 2012
5. The motorcycle diaries, Argentina, 2004
Some more biopics
1. Lawrence of Arabia, UK, 1962
2. Dangal, India, 2016
3. The social network, USA, 2010
Rebels/revolts/protests
1. Aguirre, the wrath of God, West Germany, 1972
2. The Battle of Algiers, Italy, 1966
3. A taxi driver, South Korea, 2017
Journalism
1. The post, USA, 2017
2. All the president's men, USA, 1976
3. Spotlight, USA, 2015
Con man
1. Nueve reinas, Argentina, 2000
2. The Wolf of Wall Street, USA, 2013
3. The usual suspects, USA, 1995
4. Catch me if you can, USA, 2002
5. Snatch, UK, 2000
Some feel good movies
1. Coco, USA, 2017
2. Queen, India, 2014
3. Thithi, India, 2016
4. The intouchables, France, 2011
5. Ferdinand the bull, USA, 2017
Fun to watch
1. 3 Idiots, India, 2009
2. Forrest Gump, USA, 1994
3. O brother! Where art thou, USA, 2000
Slapstick comedy
1. Sherlock jr., USA, 1924
2. Modern times, USA, 1936
3. City lights, USA, 1931
Silent in the times of talkies
1. Samsara, USA, 2011
2. Baraka, USA, 1992
3. The Artist, France, 2011
Visually stunning movies
1. The grand Budapest hotel, USA, 2014
2. in the mood for love, Hong Kong, 2000
3. Moonrise kingdom, USA, 2012
4. Loving Vincent, Poland, 2017
5. The fall, USA, 2006
Non linear narrative/ Rashomon effect
1. Rashomon, Japan, 1950
2. Hero, China, 2002
3. Pulp fiction, USA, 1994
4. Citizen Kane, USA, 1941
5. The mirror, USSR, 1975
Movies about movies
1. Cinema paradiso, Italy, 1988
2. Singin' in the rain, USA, 1952
3. The dreamers, UK, 2003
Stage performances
1. Black swan, USA, 2010
2. The prestige, UK, 2006
3. Whiplash, USA, 2014
4. The great debaters, USA, 2007
5. Birdman, USA, 2014
Musical
1. Amadeus, USA, 1984
2. Bohemian rhapsody, UK, 2018
3. Judy, UK, 2019
4. Katyar kaljat ghusli, India, 2015
5. La la land, USA, 2016
Coming of age
1. Pan's labyrinth, Spain, 2006
2. Lady bird, USA, 2017
3. Boyhood, USA, 2014
4. Spirited away, Japan, 2001
5. Dead poets’ society, USA, 1989
Love, love and love
1. Devdas, India, 1955
2. Amelie, France, 2001
3. My sassy girl, South Korea, 2001
4. Titanic, USA, 1997
5. Kimi no na wa, Japan, 2016
LGBTs
1. Blue is the warmest color, France, 2013
2. Y tu mama tambien, Mexico, 2001
3. The handmaiden, South Korea, 2016
4. I dream in another language, Mexico, 2017
5. Todo sobre mi madre, Spain, 1999
Emotions in machines
1. Her, USA, 2013
2. Wall E, USA, 2008
3. 2001: A space odyssey, UK, 1968
Class difference/ inequality
1. Parasite, South Korea, 2019
2. Mother India, India, 1957
3. Two, India, 1964
4. Roma, Mexico, 2018
5. Kaaka muttai, India, 2015
About blacks
1. 12 years a slave, USA, 2013
2. Get out, USA, 2017
3. Green book, USA, 2018
4. Blackklansman, USA, 2018
5. To Kill a mockingbird, USA, 1962
Genocides/refugees/immigrants
1. Hotel Rwanda, USA, 2004
2. Dheepan, France, 2015
3. Sin nombre, Mexico, 2009
Investigation/Detective/spy
1. Das leben der anderen, Germany, 2006
2. The chaser, South Korea, 2008
3. Raazi, India, 2018
4. Shutter island, USA, 2010
5. Vikram vedha, India, 2017
Legal/court room
1. 12 angry men, USA, 1957
2. Judgment at Nuremberg, USA, 1961
3. Contratiempo, Spain, 2016
4. El secreto de sus ojos (The secret in their eyes), Argentina, 2009
5. Court, India, 2014
Prison
1. The Shaw shank redemption, USA, 1994
2. Cell 211, Spain, 2009
3. The great escape, USA, 1963
Thrillers
1. Andhadhun, India, 2018
2. Ne le dis a personne, France, 2006
3. Amores perros, Mexico, 2000
4. Drishyam, India, 2013
5. Cache, France, 2005
Not another happy ending
1. Sairat, India, 2016
2. Requiem for a dream, USA, 2000
3. Chinatown, USA, 1974
Crime/ Gangsters
1. Cidade de deus (city of god), Brazil, 2002
2. Goodfellas, USA, 1990
3. Once upon a time in America, Italy, 1984
4. No country for old men, USA, 2007
5. Internal affairs, Hongkong, 2002
Revenge
1. Oldboy, South Korea, 2003
2. Relatos salvajes (Wild tales), Argentina, 2014
3. Kill bill vol.1 and 2, USA, 2003-04
4. Léon : The professional, France, 1994
5. V for vendetta, UK, 2004
Serial killer
1. I saw the devil, South Korea, 2010
2. Perfume, Germany, 2006
3. Se7en, USA, 1995
4. Memories of murder, South Korea, 2013
5. The silence of the lambs, USA, 1991
Psychological horror
1. The Shining, USA, 1980
2. A tale of two sisters, South Korea, 2003
3. The babadook, Australia, 2014
Supernatural horror
1. The wailing, South Korea, 2016
2. Ringu, Japan, 1998
3. The descent, UK, 2005
4. The conjuring, USA, 2013
5. The exorcist, USA, 1973
Horror comedy
1. Manichitrathazu, India, 1993
2. Pee mak, Thailand, 2013
3. Shaun of the dead, UK, 2004
Schizophrenia, Dissociative identity disorder, Mental illness
1. One flew over the cuckoo's nest, USA, 1975
2. Joker, USA, 2019
3. Fight club, USA, 1999
4. Psycho, USA, 1960
5. A beautiful mind, USA, 2001
Memory loss/ Amnesia/ Alzheimer
1. Eternal sunshine of the spotless mind, USA, 2004
2. Memento, USA, 2000
3. Eraser in my head, South Korea, 2004
Depicting World War II
1. Das boot, Germany, 1981
2. Dunkirk, USA, 2017
3. Downfall, Germany, 2004
4. Saving Private Ryan, USA, 1998
5. The Bridge on the river kwai, UK, 1957
Anti war
1. Taegukgi, South Korea, 2004
2. Hacksaw ridge, USA, 2016
3. The great dictator, USA, 1940
4. Dr. Strangelove, UK, 1964
5. Welcome to dongmakgol, South Korea, 2005
Holocaust
1. The Pianist, France, 2002
2. Schindler's list, USA, 1993
3. Life is beautiful, Italy, 1997
4. The boy in stripped pajamas, UK, 2008
5. Jojo rabbit, USA, 2019

बुधवार, 11 सितंबर 2019

सोना हिरणी


 ये है हमारी प्यारी सोना।

इसकी माँ इसे जन्म देते ही श्वानों का शिकार बन गई पर गांव के कुछ लड़के इसे बचा लाए थे।
मारवाड़ में दूजी जातियों के लोग घायल हिरणों को बिश्नोईयों की ढ़ाणी छोड़ आते हैं, ज्यों मेले में खोया कोई बच्चा घर पहुंचा रहे हों। उन लड़कों की पहचान मेरे काका के घर थी, सो वे मृग शावक काका को सौंप निश्चिन्त हुए।
काका के पोते-दोहिते यानि मेरे भतीजे-भांजे बड़े ऊधमी हैं। उन्होंने अपने मन से किया तो लाड कोड ही पर बिल्ली की गुदगुदी चूहे की मौत। उन के लूमने झूमने से छौने का कलेजा हिल गया। डर से मर जाना हिरणों में आम बात है। काका को लगा कि यहाँ रहा तो यह जीव नहीं बचेगा। इस तरह इस शावक का नया ठिकाना हमारा घर तय हुआ। बच्चों ने रोष किया, पैर पटके पर दो तीन दिन बाद साथ खेलने देने की शर्त पर समझौता हो गया।
घर लाकर मृग शिशु मैंने मम्मी को सम्भलाया। गोद में लेते ही मम्मी ने नाम रख दिया- सोना। मम्मी और पूजा दोनों ही किसी जीव का नाम रखते वक़्त कुछ सोचते नहीं है। सीधा एक ही नाम लेते हैं- सोना। गाय की बछिया भी सोना है, गेट पर बैठी कुतिया भी सोना है। घर में सुबह शाम सिर्फ दूध पीने के टाइम मुँह दिखाने वाली बिल्ली है, वो भी सोना है। जेठ की गर्मी में डामर की सड़क पर झुलस कर गिरी चिड़िया पानी पिलाने लाई जाए या चौमासे में कुत्तों की काटी हिरणी पट्टी बांधने लाई जाए, नाम सबका सोना ही रहेगा। यह अघोषित नियम है। नाम एक से, सबको स्नेह भी एक सा।
सो इस सोना के लिए बॉटल निप्पल का इंतज़ाम हुआ, दूध पिलाया गया। गर्माहट दी गई। शुरू के एकाध घण्टे सोना डरी-फरी सी रही। लेकिन इसे पहली गन्ध इंसान की ही मिली थी सो सहज होने में समय न लगा। उस शाम तक सद्य: जात सोना अपने पिछले पैरों को संभालना सीख रही थी।
सोना हफ़्ते भर केवल दूध पर रही। फिर बाड़े में घूमने लगी तो एकाध पत्ते चबाने शुरू किए। अब बिस्किट खाती है,रोटी का टुकड़ा चबा लेती है। एक अचम्भा भी हुआ। मम्मी मिर्च की चटनी बनाने के लिए पत्थर की खुल पर मिर्च बाँट रही थी। पास खड़ी सोना लाल मिर्च के बचे हुए फूंतरे खाने लगी। हम लोग चिंतित हुए। गूगल पर सर्च किया कि सेहत के लिए सही है कि नहीं। सर्च रिजल्ट्स में नागालैंड की एक ख़बर पढ़ने को मिली। वहाँ की भूत झोलकिया संसार की सबसे तेज मिर्ची मानी जाती है। आम मिर्ची से चार सौ गुना तक तेज़। अचम्भा ये कि हिरण इस नागा मोरिच के खेत के खेत साफ़ कर जाते हैं। अब सोना को भी कभी कभार मिर्च की ट्रीट मिलने लगी है।
एक रात सोना की सेहत बिगड़ गई। उसकी गर्दन अचानक तेज़ी से कांपने लगी। पापा किसी जागरण-जमे में गए हुए थे, मैं भी घर से बाहर ही था। गई साल श्वानों की शिकार बनी एक हिरणी पूरी तरह ठीक होने के दो दिन बाद इसी तरह गर्दन कांपने से चल बसी थी। पूजा को लगा- हो न हो, इसे कुत्तों के दांत लगे हैं और यह भी उसकी तरह रेबिड हो गई है। मोहल्ले में एक लड़का राजुवास से वेटरनरी कम्पाउडर का कोर्स कर के आया है। उसके घर के किवाड़ बजाए गए। बदकिस्मती से वो भी घर न था। फिर संस्था के लोगों से सलाह ली गई। जाम्भोजी का नाम ले मैथी अजवायन का घोल पिलाया गया। रेबीज़ न था, कोई सामान्य बुख़ार शायद रहा हो। जो भी था, जाम्भोजी ने और मैथी-अजवायन ने कार किया और अगले दिन दोपहर तक सोना फिर से कूदने लगी।
शकुंतला के मृग दुःखी होते तो मुख में निगला घास उगल देते थे। उद्गलितदर्भकवला मृगाः। हमारी सोना इससे उलट है। मनमौजी सोना खुश होती है तो चबाया हुआ मोठ उगल देती है और छलाँगे मारने लगती है। महादेवी जी की सोना से ज़रूर इस सोना में साम्य है। कम से कम स्नेह प्रदर्शन की विधियों में। हमारी सोना भी उस सोना की ही तरह आगे पीछे भाग कर, बैठे रहने पर कपड़ों के छोर चबाते रह कर अपना स्नेह दिखाती रहती है।
आसोजी मेला आने वाला है। पहले हमने यह सोचा था कि तब मेळातियों के साथ सोना को संस्था के मृग वन में भेज दिया जाएगा। लेकिन तब तक सोना डेढ़ महीने की ही होगी। कम से कम चार महीनों तक मृग शावक माँ की देखभाल चाहता है। इसी बहाने से सोना की दोनों माँएं- पूजा और मेरी मम्मी इसे भेजने को राजी नहीं हैं। तो शायद सोना फागण वाले मेले में अपने जैसों के बीच पहुंचेगी। जहाँ वो यहाँ से ज़्यादा खुश रहेगी।
हम इंतज़ार करेंगे- अगली सोना का।

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

Stop Glorifying Criminals and Idiots


Dear media,
Please,
Stop Glorifying Criminals and Idiots!
अपराधियों का और मूर्खों का महिमामंडन बन्द किया जाए।

"सलमान की फैन ने दो दिन से खाना नहीं खाया"
"सलमान के प्रशंसकों का रो रो कर बुरा हाल"
Seriously ?
ये भारत के नेशनल मीडिया की हेडलाइंस होनी चाहिए ?
ऐसे तो राम रहीम के चेले सर मुंडवा कर बैठ गए थे।
आसाराम के फैन हर पेशी के बाद उसकी गाड़ी के टायरों के निशान चूमते रहते हैं।
लेकिन ये उन लोगों की मूर्खता है।
इस का महिमामंडन करने की क्या आवश्यकता है ?

"सलमान के लिए प्रार्थनाओं का दौर जारी"
"सोशल मीडिया पर दुआ कर रहे हैं लोग"
मीडिया इस तरह से दिखा रहा है जैसे सलमान के साथ बहुत बड़ी ज्यादती हो गई हो, ज़ुल्म हो गया हो।
उसने अपराध किया है, भुगतेगा! सीधी सी बात है।

"राखी सावंत ने कहा- सलमान को फंसाया गया है"
"एजाज खान ने कहा- किसी और का पाप ढ़ो रहे हैं सलमान"
सलमान ने शिकार किया या नहीं, ये तय करना कोर्ट का काम है, इन फुटेज के भूखे लोगों का नहीं।
ad verecundiam fallacy बन्द हो। चमचों के कह देने से "भाई" निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता।

"फरिश्ते से कम नहीं है सलमान"
"सलमान करते हैं इतना पैसा दान"
"सलमान ने बीइंग ह्यूमन से बचाई इतनी जानें"
Okay, मैं 50 लोगों के दिल के ऑपरेशन के पैसे भरने के लिए तैयार हूँ, मुझे इन टीवी चैनल्स के सम्पादकों पर गाड़ी चढ़ाने की अनुमति दी जाए।
बीइंग ह्यूमन की टैगलाइन "नौ सौ चूहे खा बिल्ली हज को चली" है। और कुछ नहीं।
पहली बात, ये पश्चाताप नहीं है, दिखावा है।
पश्चाताप तब कहा जाता है, जब गलती स्वीकार की जाए, यहां तो सिद्ध किया जा रहा है कि गाड़ी ड्राइवर चला रहा था।
और पश्चाताप हो, तो भी करते रहिए। कानून में जो दण्ड है, वो तो भुगतना ही पड़ेगा।
दूसरी बात ये बैड बॉय की इमेज सुधारने का प्रयास है और इस फसल को वकील बाक़ायदा कोर्ट में काटते हैं कि "मेरा मुवक्किल ये काम भी करता है, इसलिए सजा कम की जाए, जमानत दी जाए"

आपको सलमान के नाम पर टीआरपी बढ़ानी ही है, तो दिखाइए कि उसे घुटनों पर लाने वाले लोग कौन हैं। कौन लोग हैं जो ना झुके, ना बिके।
दिखाइए कि किस तरह हिट एंड रन केस के गवाह रविन्द्र पटेल की किन परिस्थितियों में मौत हो गई।
दिखाइए कि आर्म्स एक्ट के पिछले मुकदमों का किस तरह अदालतों में मज़ाक बनाया गया था।
लेकिन आप नहीं दिखाएंगे, क्योंकि इससे आप के स्वार्थ पूरे नहीं होते।

विडम्बना है कि आप जो भी दिखाएंगे, लोगों को देखना पड़ेगा। विकल्प ही नहीं है।
इसलिए, लगे रहिए।
लेकिन ख़ुद को पत्रकार कहना बन्द कर दीजिए।
क्योंकि पत्रकार का काम ये बताना नहीं होता कि जेल में बंद एक पोचर ने रात में टॉयलेट कितने बजे यूज़ की थी।

बुधवार, 8 नवंबर 2017

अंडर द डोम

 एक चीनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म है- अंडर द डोम।

खोजी पत्रकार चाए जिंग ने 2015 में अपने शहर की हवाओं में घुले जहर पर इसे बनाया था।
दरअसल,चाए की अजन्मी बच्ची को विषाक्त वायु ने ट्यूमर दे दिया था और जन्म लेते ही उसका ऑपरेशन किया जाना पड़ा था। इसी से आकुल हो चाए ने यह फिल्म बनाई।
यह फिल्म सोशल मीडिया पर केवल 3 दिनों में 30 करोड़ लोगों द्वारा देखी गई। चौथे दिन चीन की सरकार ने अपनी पर्यावरण नीतियों पर उठते सवालों से डर कर चीन में इसे प्रतिबंधित कर दिया।
मुझे आज यूट्यूब पर कहीं भटकते हुए यह फिल्म टूटे फूटे इंग्लिश सबटाइटल्स के साथ मिली। और मुझे लगा कि आज दिल्ली के भी वही हाल हैं, जो "अंडर द डोम" फिल्म बीजिंग, शांगक्जी या अन्य चीनी शहरों के बारे में बताती है।
कुछेक साल पहले "अंडर द डोम" नाम से एक साइंस फिक्शन टी वी सीरीज आई थी, जिसमें एक शहर के आकाश को पारदर्शी डोम घेर लेता है, जिससे लोगों का वहाँ से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। चाए की डॉक्यूमेंट्री का नाम इस सीरीज से लिया गया है। चाए कहती है कि आज हमारे लगभग सभी शहर वैसे ही डोम के अंदर घुट रहे हैं, जहरीली हवाओं ने हमें घेर रखा है।
डॉक्यूमेंट्री में प्रदूषण दूर करने में सरकारों की नाकामी, अनिच्छा और लापरवाही जाहिर करने के बाद चाए कहती है कि मुझे मरने से डर नहीं लगता, लेकिन मैं इस तरह जीना नहीं चाहती। इस हेतु वांछित परिवर्तन के लिए सरकारों पर निर्भर रहने के बजाय चाए स्वयं पहल करने पर जोर देती है।
लंदन में 1952 में "द ग्रेट स्मॉग" 4 दिन तक बना रहा था। हजारों लोग मर गए, श्वास नहीं ले पाए। पिट्सबर्ग के भी ऐसे ही हाल हुआ करते थे। आज इन दोनों की हालत हम से हज़ार गुना अच्छी है। जब ये शहर सुधर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं ?
खुशी की बात ये है कि 3 दिन तक ही विमर्श का केंद्र बन पाई चाए की इस फिल्म का लोगों पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इस फिल्म को चीन के पर्यावरण मंत्री तक ने चीन की "साइलेंस स्प्रिंग" कह दिया था। ( साइलेंस स्प्रिंग कीटनाशकों के जहर के खिलाफ रशेल कार्सन की किताब थी, जिसने अमेरिका में हड़कम्प मचा दिया था। ) लोगों को पौधे लगाने के लिए प्रेरित करने, वाहनों का प्रयोग कम करने के लिए प्रेरित करने और पर्यावरण के लिए कुछ करने का जज्बा देने के लिए ये फिल्म बहुत सराही गई।
हालांकि दिल्ली के सिवाय शेष भारत में हालात उतने बुरे नहीं है, जितने चीन में है। फिल्म में चाए एक 5-6 साल की बच्ची से पूछती है कि क्या तुमने कभी सफेद बादल देखे हैं ? बच्ची दो टूक कहती है- कभी नहीं! भारत के बच्चे अभी इस हाल तक नहीं पहुंचे हैं। लेकिन समय रहते अगर हम नहीं चेते, तो ये दिन भी ज्यादा दूर नहीं है।
सरकारी स्तर पर प्रयास होंगे, इसके लिए इंतजार न करें, स्वयं ही पहल करें। गांधी जी कह गए हैं- Be the change. पौधे लगाएं, निजी वाहनों का प्रयोग कम और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग ज्यादा करें। आप इतना कर देंगे, यही काफी है।
प्रकृति क्षण रुष्टा क्षण तुष्टा नहीं है। नाराज इतनी जल्दी नहीं होती, दहाईयों तक छेड़ा है तब ये हाल हुए हैं। कुछ दिन भुगतना तो पड़ेगा ही। लेकिन मनाने की कोशिशें शुरू तो की जाएं, हल भी निकलेगा।
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