संदेश

नारी......

हर रोज कई तितलियों के पंख मरोड़े जाते हैं। हर रोज किसी हिरणी पर कुत्ते छोड़े जाते हैं । हर रोज कई कलियों को माली खुद मसल देता है। हर रोज किसी चिड़िया के अरमां गिद्ध कुचल देता है। रोज कहीं दामिनी को भेड़िये नोंच नोंच खा जाते हैं। देख अकेली कोयल कौए उठा चोंच आ जाते हैं। कहीं छह माह की बेटी की इज्जत से खेला जाता है। पहली कक्षा की बच्ची को धंधे में ठेला जाता है। नन्ही बिटिया अब बापू संग रहने से कतराती है। भाई का चेहरा देख कर भी मन ही मन घबराती है। नारी को वस्तु बतलाने का जतन रोज होता जाता है। स्त्री पूजा वाली संस्कृति का पतन रोज होता जाता है। जहाँ द्रोपदी के चीर हरण पर महाभारत हो जाती थी। और सीता के अपहरण पर लंका गारत हो जाती थी। जहाँ पद्मावती न दिखलाने को रतनसिंह अड़ जाते थे। अस्मिता की रक्षा खातिर खिलजी से लड़ जाते थे। उस भारत में ये हाल कि दुष्कर्मियों का राज हुआ। बेटी मार लटकाने वालों के सिर मुखिया का ताज हुआ। नेताओं को परोसी बेटी मुट्ठी कस कर रह जाती है। लोकलाज के नाम सारे कुकृत्यों को सह जाती है। ऐसे हालातों में भी प्रशासन कुछ नहीं कर पाता है। इन लोगों का रौ...

Vijay : The Street Child (Story of an Orphan Boy)

चित्र
छुट्टियों में कुछ नया करने का जोश, अनाथ विजय की कहानी, 80 रूपए की डिजिटल कैसेट, दोस्त के दोस्त से उधार लिया कैमरा, एंड्राॅईड में रिकार्ड की गई आवाज और घर पर की गई एडिटिंग। कुछ इस तरह बनी यह शाॅर्ट फिल्म। अपनी तरफ से पहला प्रयास था तो ज्यादा उम्मीदें तो मैंने रखी नहीं थी। खैर, जैसी भी बनी है, आपके सामने है। देखिए, राय दीजिए, अच्छी लगे तो शेयर भी कीजिए। शायद किसी के दिल पर असर कर जाए। :)

बागी होती बंदूकें

कैसे गाऊँ जैजैवन्ती,दरबारी और मल्हार को। कैसे गाऊँ बसंत बहारें, कैसे गाऊँ श्रृंगार को। यहां गांवों में रोते दिखते झुग्गी छप्पर झोंपड़ियाँ। सूखे कांटे जैसे चेहरे, भूख से ऐंठी अंतड़ियाँ।। पेड़ पर लटकी लाशें दिखती भूमिपुत्र किसानों की। एक तिहाई जनता भूखी, मोहताज दानें दानों की। दूर देशों में छुपाई जाती कालेधन की संदूकें। इन्हीं कारणों से वतन में बागी होती बंदूकें। ऐसे हालातों में शब्दों में प्रीत नहीं ला सकता मैं। शोकसभा में श्रृंगार के गीत नहीं गा सकता मैं।। मैंने भारत माता के दिल के छाले देखें हैं। बुद्धिजीवियों की जुबान पर लटके ताले देखें है। मैंने सिंहासन दरबारों को निष्ठुर होते देखा है। वीर शहीदों की रूहों को छुप छुप रोते देखा है। जहर बोती सियासत की कैसे मैं जय कार करूं। हत्यारों को सिंहासन पर कैसे मैं स्वीकार करूं। मैं युवाओं को इंकलाब की राग सिखाता जाऊँगा। धवल खादी के दामन के दाग दिखाता जाऊँगा। देशद्रोहियों के वंदन की रीत नहीं ला सकता मैं। शोकसभा में श्रृंगार के गीत नहीं गा सकता मैं। >> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"

अब इंकलाब जरूरी है

चीख चीख रोता है मेरा दिल भारत के हालातों पर। मेरी कलम नहीं लिख पाती गीत प्रेम मुलाकातों पर। मैंने भारत माता को अक्सर रोते हुए देखा है। और वतन की सरकारों को सोते हुए देखा है। सरकारें जो पूरे भारत वर्ष की भाग्य विधाता है। सरकारें जो संविधान की रक्षक और निर्माता है। सरकारें जो वतन की हिफाजत खातिर बुनी गई। सरकारें जो जनता हेतु जनता द्वारा चुनी गई। सरकारें जो संरक्षक है देश में लोकतंत्र की। सरकारें जो शिक्षक है कत्र्तव्यों के मंत्र की। सरकारें जो जनता के सेवक का पर्याय है। सरकारें जो उम्मीद है, आशा है, न्याय है। सरकारें जो परिभाषा है वतन के विकास की। सरकारें जो अहसास है भरोसे और विश्वास की। सरकारें जो सच्चाई और देशप्रेम की मिसाल है। सरकारें जो अराजक लोगों के लिए महाकाल है। आज वतन में वही सरकारें गुण्डागर्दी करती है। रक्षक ही भक्षक बन बैठे, जनता इनसे डरती है। खादी और खाकी दोनों ही अब मर्यादा से दूर हुए। चरित्रहीन नेता बन बैठे ,दौलत के नशे में चूर हुए। जो नेता संसद में देश की इज्जत उछाला करते है। और देश की आंखो में अक्सर मिर्च डाला करते है। भोले भाले लोग यहां के भा...

अब इंकलाब जरूरी है

सिसक सिसक कर रो रही है मेरी भारत माता आज। बिलख बिलख कर रो रहे हैं संविधान निर्माता आज। तड़प तड़प कर रोता होगा गांधी सुभाष का दिल भी आज। चीख चीख कर रोते होंगे भगतसिंह,बिस्मिल भी आज। रोती होगी गंगा जमना,रोते कश्मीर-हिमालय आज। रोते होंगे मंदिर मस्जिद,रोते सभी देवालय आज। रोती होगी कन्याकुमारी,रो रही गौहाटी आज। रो रहा है मरू प्रदेश भी,रो रही चैपाटी आज। आज देश में चारों ओर गुण्डों का प्रशासन है। और जूती की नोक पर पड़ा हुआ अनुशासन है। आज शास्त्री की पीठ में छुरी भोंक दी जाती है। और संसद की आंखो में मिर्च झोंक दी जाती है। बहुत सह लिया हम लोगों ने, अब बदलाव जरूरी है। चुप रहने से काम न चलेगा, अब इंकलाब जरूरी है। आज संसद चला रहे है गुण्डे तस्कर और डाकू। हाथापाई, मारपीट, छीनाझपट्टी और चाकू। कोई स्पीकर की टेबल का माईक उखाड़ चला जाता है। और सदन की सम्पत्ति के कागज फाड़ चला जाता है। संसद स्थगित करने को अब बहाने बनाए जाते है। पानी की तरह जनता के रूपए बहाए जाते है। राजनेता बर्बाद कर रहे है मेरे भारत देश को। और बदनाम किया जा रहा है खादी वाले वेश को। आज वतन के लोग यहां के नेताओं से त्रस्त है। लेकिन युवा पीढी...

यादें

पिछली पोस्ट पर बहुत बड़े बड़े ब्लागरों के कमेण्ट प्राप्त हुए तो दिल में कुछ और नया लिखने की इच्छा जगी। तो कल रात को एक छोटी सी कविता और लिखी अब ये तो पता नहीं कि इसे क्या कहते है। कहीं से सुना था कि ये कुण्डली है खैर जो भी हो जो दिल में आया लिख दिया देखकर बताइएगा कैसी लगी पोस्टकार्ड का गया जमाना, बीती बातें तार की। फैक्स हुआ ओल्ड फैशन, टेलीफोन चीज बेकार की।। टेलीफोन चीज बेकार की, मोबाईल क्या आया। कैमरा, टार्च और अलार्म, सब का हुआ सफाया।। सब का हुआ सफाया, घड़ी पता नहीं कहां खोई। कैसेट बिचारी बैठ के, बंद कमरे में रोई।। बंद कमरे मे रोई, टेप रिकार्डर अब कौन बजाए। रेडियो के आगे बैठ कर, अब महफिल कौन सजाए।। अब महफिल कौन सजाए, चीजें आई जब नई नई। कौन जाने और क्यों जाने, टेलीफोन डायरी कहां गई।। ‘लक्ष्य’ जमाना बदल रहा, अब बस यादें रह जाएगी। कभी चुपके से कानों में, जो अपनी कहानी कह जाएगी।। -लक्ष्मण बिश्नोई और अब अपडेट समीर लाल जी समीर ने इस कविता को सम्पादित करके कुछ यूँ शुद्ध कुंडली का रूप दिया पोस्टकार्ड का गया जमाना, बीती बातें तार की। फैक्स पुरानी बात हो गया, फोन चीज बेकार की।। फ...

बापू

एक बापू गांधी थे, दूजे बापू आप। वो सत्य अहिंसा के साधक, आप पाप के बाप।। आप पाप के बाप, शर्म लज्जा सब खो गई। हे राम की वाणी अब, हाय राम हो गई।। हाय राम हो गई, ढोंगी हुए सब महात्मा। अधर्म पैर पसारता, धर्म का हुआ खात्मा।। धर्म का हुआ खात्मा, वासना चारों ओर। मुख में हरि ओम जपते, मन में बैठा चोर।। मन में बैठा चोर, रावण को देते टक्कर। जर जोरू और जमीन के रोज चलते चक्कर।। कहता लक्ष्मण बात यह, यही सबसे बड़ा रोग। ऐसे ढोंगी बाबाओं को, फिर भी पूजते लोग।।