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Stop Glorifying Criminals and Idiots

Dear media, Please, Stop Glorifying Criminals and Idiots! अपराधियों का और मूर्खों का महिमामंडन बन्द किया जाए। "सलमान की फैन ने दो दिन से खाना नहीं खाया" "सलमान के प्रशंसकों का रो रो कर बुरा हाल" Seriously ? ये भारत के नेशनल मीडिया की हेडलाइंस होनी चाहिए ? ऐसे तो राम रहीम के चेले सर मुंडवा कर बैठ गए थे। आसाराम के फैन हर पेशी के बाद उसकी गाड़ी के टायरों के निशान चूमते रहते हैं। लेकिन ये उन लोगों की मूर्खता है। इस का महिमामंडन करने की क्या आवश्यकता है ? "सलमान के लिए प्रार्थनाओं का दौर जारी" "सोशल मीडिया पर दुआ कर रहे हैं लोग" मीडिया इस तरह से दिखा रहा है जैसे सलमान के साथ बहुत बड़ी ज्यादती हो गई हो, ज़ुल्म हो गया हो। उसने अपराध किया है, भुगतेगा! सीधी सी बात है। "राखी सावंत ने कहा- सलमान को फंसाया गया है" "एजाज खान ने कहा- किसी और का पाप ढ़ो रहे हैं सलमान" सलमान ने शिकार किया या नहीं, ये तय करना कोर्ट का काम है, इन फुटेज के भूखे लोगों का नहीं। ...

खेजड़ली बलिदान कथा

अरे! जब राजमहल बन रहा है और उसका चूना पकाने के लिए लकड़ियाँ चाहिए, तो राजा अपने राज्य में चाहे जहां से लकड़ी कटवाए! बिश्नोई कौन होते हैं रोकने वाले ? दीवान गिरधरदास ने राजा अभयसिंह को उसकी शक्तियाँ याद दिलाई। राजा असमंजस में खड़ा रहा! दीवान ने उसे अपनी युक्तियों पर विश्वास करने को कहा। बिश्नोईयों को डराने धमकाने के लिए सेना साथ ले जाने की अनुमति मांगी और फिर से खेजड़ली की ओर चला आया। दीवान दो दिन पहले भी आया था। तब उसने कहा था कि अगर गांव के लोग मिल कर उसे कुछ पैसे दे देते हैं तो वो लकड़ियों की व्यवस्था कहीं और से कर लेगा। दीवान को लगा कि अपने पेड़ बचाने के लिए गांव वाले उसे इतनी सी भेंट तो चढ़ा ही देंगे। लेकिन गांव वालों के लिए तो ये सिद्धांतों का संघर्ष था। सिद्धांतों के संघर्ष में साध्य और साधन दोनों की पवित्रता बने रहना अनिवार्य होता है। ऐसे में खेजड़ली गांव की ही एक बिश्नोई नारी अमृता ने आगे बढ़ दीवान को दो टूक जवाब दे दिया- दाम दिया दाग लगे, टको नी देवां डाँण। रिश्वत क्यों दें ? रिश्वत के लिए एक टका भी नहीं मिलेगा! दीवान भड़क उठा। राजपुरुष होने की धौंस जमाई और सबक सिखाने की धमकी ...

हृदयहीनता की पराकाष्ठा

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आशा साहनी। वही अभागी मां, मुम्बई के लोखंडवाला से कल जिसका कंकाल बरामद हुआ है। अमेरिका में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटे की उससे अंतिम बार फोन पर बात अप्रैल 2016 में हुई थी। अकेले रह कर टूट चुकी बूढ़ी मां फोन पर रोई और बेटे से कहा कि अब अकेले रहा नहीं जाता। कहीं कोई वृद्धाश्रम तलाश करुँगी और वहीं रहूँगी। नाराज थी, गुस्से में थी तो कह दिया होगा कि आईंदा मुझे फोन मत करना और 'आज्ञाकारी' बेटे ने सचमुच सवा साल तक खबर ही न ली! बेटे को सवा साल से मालूम ही नहीं कि उसे जन्म देने वाली माँ किस हाल में है, जिंदा भी है कि मर गई। हृदय हीनता की पराकाष्ठा! इसी बेटे के जन्म पर उस माँ ने उत्सव मनाया होगा। बेटे ने कर्त्तव्य निर्वहन के नाम पर पैसे जरूर भेजे थे, कंकाल के सिरहाने 50 हजार रुपये पड़े मिले हैं। लेकिन माँ दौलत कब चाहती है। उसकी दौलत तो बेटा हुआ करता है। ये माँ तो इतनी अभागी रही कि उसका बेटा दौलत को ही माँ मान बैठा। और, सोसायटी के लोग ? पड़ोसी ? निष्ठुर! निर्मम! तटस्थ ! बेटे को एक बार ई मेल किया था क्योंकि सोसायटी के रख रखाव के खर्चे के पैसे बुढ़िया ने 6-7 महीनों से भरे नहीं थे। क...

रक्षाबंधन विशेष - मायरो

बीरा बणजे तू जायल रो जाट, बणजे खिंयाला रो चौधरी। कथा लगभग छह सात सौ साल पहले की यानि कि सल्तनत काल की है और यूं है कि नागौर में दो चौधरी हुआ करते थे। नाम था गोपाल जी और धर्मो जी। गोपाल जी जायल गांव के बासट गोत के जाट और धर्मो जी खिंयाला के बिडियासर । दोनों चौधरी उस समय के पटवारी के पद पर थे। दिल्ली के सुल्तानों के लिए लगान संग्रहण करने का कार्य किया करते थे और ये काम वो दोनों कई सालों से किया करते थे। क्योंकि सुल्तान बदल जाया करते हैं, पटवारी नहीं बदला करते। दोनों चौधरी साल में एक बार किसानों से निर्धारित रकम वसूला करते, जो भी सुल्तान गद्दी पर होता, उस तक पहुंचा दिया करते और अपनी तनख्वाह ले लिया करते। इस बार हुआ यूं कि सुल्तान ने लगान बढ़ा दिया। कारण क्या रहा, मुझे नहीं मालूम। कोई नई लड़ाई छेड़ बैठा होगा, कोई नई खुराफात सूझी होगी या कोई नई शादी की मन में आ गई होगी। दिल्ली की जायज नाजायज मांगे दूर कहीं खेतों में खप रहा किसान हमेशा से ही आंखे मींच पूरी करता रहा है। खैर, कारण जो भी रहा हो, कहानी को इस बात से मतलब है कि चौधरियों को दुगुने पैसे ले कर जल्दी से जल्दी वहां पहुंचने के लिए प...

मानव धर्म

नहीं आवश्यक परिक्रमा देवालयों के स्वर्णिम विग्रह की। नहीं आवश्यक भक्ति साधना किसी कुपित क्रोधी ग्रह की। नहीं आवश्यक है कि तुम तीर्थ यात्रा करते घूमो। नहीं आवश्यक है कि तुम मस्जिदों की चौखट चूमो। किसी धर्म ग्रन्थ का पाठ भी नहीं आवश्यक है कभी। गंगा यमुना का घाट भी नहीं आवश्यक है कभी। मानव हित में महान पुण्य, परोपकार का कर्म है। भूखे को रोटी देना ही सच्चा मानव धर्म है। ----> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"

सपनों को मरने मत देना

तेज आँधियों को दिये के, प्राण कभी हरने मत देना। सपनों को मरने मत देना।। गगरी फूटी, नई बनाओ। माला टूटी,फिर से सजाओ। नन्हें कदम जब बढ़ना चाहें, पकड़ अंगुली, हिम्मत बढ़ाओ। चलना सीख रहे बच्चे को गिरने से डरने मत देना। सपनों को मरने मत देना।। धूप नहीं,उजियारा देखो। दुनिया से कुछ न्यारा देखो। तूफानों से कांपे जगत जब, पार कहीं किनारा देखो। भँवरों से भी भिड़ जाने दो, कश्ती खड़ी करने मत देना। सपनों को मरने मत देना।। ----> लक्ष्मण बिश्नोई 'लक्ष्य'

मेरे जीवन की हिस्सेदार हर नारी को समर्पित

जगती में जब मेरा जीवन, आहत अकुलाए आघातों में। क्लांत कलेजा कूक पड़े जब, दु:ख की चुभती बरसातों में। जब मन के प्रकाशित कोनों में, स्याह अंधेरा जम जाए। जब प्रगति पथ पर जीवन रथ, खा हिचकोले, थम जाये। उमंग भरी इन आँखों में मेरी, यह दृश्य जो फिरा कभी- शिखरों पर बैठा मैं, गर्त में अभी गिरा,हाय!गिरा अभी तब तुम आना, प्रेरक बनकर, उम्मीदों की सौगात लिए। तब तुम आना, प्रथम किरण सी, मनमोहक प्रभात लिए। तुम दीपक बनकर, मुझको, जग में तम से लड़ना सिखला देना। कर सारथ्य जीवन रथ का, राह नई तुम दिखला देना। मेरे तुम पर विश्वासों को, साबित करना तुम सत्य सदा। सफल पुरुष की शक्ति नारी, सत्य रहे यह तथ्य सदा।। ---> लक्ष्मण बिश्नोई लक्ष्य

आओ वृक्ष लगाएं हम

प्रत्येक प्रसून-पत्र जिसके मानुष हित में न्यौछावर हैं, जिसकी शाख प्रशाख तले छाया पाते यायावर हैं, जिसके सुरभित कुसुम सदा ही मान बने, सम्मान बने। जिसके होने से ही खेत बने खलिहान बने, उद्यान बने। जिसने मनुज को प्राणवात सा जीने का आधार दिया, जिसके झुरमुटों ने मां वसुधा के आंचल का श्रृंगार किया, जिसकी छवि छटा ही मनमोहक और मतवाली है। जिसकी शस्य श्यामल कांति मन को छूने वाली है। जिसने नभचरों को निवास दिया,रहवास दिया। फल-फूल दिए,उल्लास दिया,हुल्लास दिया। अपने उत्पादों से पालन पोषण का विश्वास दिया। उपकारों से समृद्ध सभ्यताओं का इतिहास दिया। पुराण जिसके पत्र पत्र में विबुधों सा विश्वास जताते हैं, मूल छाल और डाल डाल में त्रिमूर्ति का वास बताते हैं। जिसके संवर्द्धन से दस पुत्रों के पालन सा पुण्य मिले, जिसकी छांव तले जगत को दशमलव और शून्य मिले। जिसकी छांव तले ही सनातन-बौद्ध-जैन-से पंथ बढ़े। जिसकी छांव तले ऋषियों ने उपनिषदों-से ग्रंथ गढ़े। बाईबिल जिसको परमेश्वर की अनुपम देन कहती है। जिसे काटने की मनाही पैगम्बर के फरमानों में रहती है। ऐसे हरे वृक्ष के सरंक्षण का उत्तरदायित्व...

नव भारत

उमंग,उत्साह और स्फूर्ति,जन-जन में सृजित करें। चलो युवानों, वीर जवानों ! नव भारत निर्मित करें। हे मतवालों, हिम्मतवालों, नव भारत निर्मित करें। विवेकानंद सा तप हमीं है,गुरू नानक सा जप हमीं है। गांधी की अहिंसा भी हम हैं,प्रतिशोध की हिंसा भी हम हैं। मीरा जैसी भक्ति हम हैं,हनुमान सी शक्ति हम हैं। देवदत्त,पांचजन्य भी हम हैं,महाप्रभु चैतन्य भी हम हैं। हम पतंजलि के योग ध्यान हैं,गौतम बुद्ध का कैवल्य ज्ञान हैं। हम वीर शिवा-से बलशाली हैं,जगदम्बा,दुर्गा,महाकाली हैं। कृष्ण कन्हैया लाल हमीं हैं,दशानन का काल हमीं हैं। भगवद् गीता के ज्ञाता हम हैं,नव भारत निर्माता हम हैं। आदर्श हमीं देते आए हैं,नाव हमीं खेते आए हैं। फिर क्यों छा रही निराशा, उत्साह हीनता और हताशा। क्यों सोए हो,निराश पड़े हो, हिम्मत करो, उठ खड़े हो। पूरे करें स्वप्न तिलक के, कोई ना सोये रो बिलख के, प्रताप शिवा सा स्वाभिमानी, बनें हर इक हिन्दुस्तानी। बनें फिर से जगद्गुरू हम, गौरवमयी वर्तमान बनाएं। गंगा जमुनी तहजीब वाला, प्यारा हिन्दुस्तान बनाएं। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में,अपना सर्वस्व अर्पित करें। चलो युवानों, वीर जवानों!नव भारत न...

नारी......

हर रोज कई तितलियों के पंख मरोड़े जाते हैं। हर रोज किसी हिरणी पर कुत्ते छोड़े जाते हैं । हर रोज कई कलियों को माली खुद मसल देता है। हर रोज किसी चिड़िया के अरमां गिद्ध कुचल देता है। रोज कहीं दामिनी को भेड़िये नोंच नोंच खा जाते हैं। देख अकेली कोयल कौए उठा चोंच आ जाते हैं। कहीं छह माह की बेटी की इज्जत से खेला जाता है। पहली कक्षा की बच्ची को धंधे में ठेला जाता है। नन्ही बिटिया अब बापू संग रहने से कतराती है। भाई का चेहरा देख कर भी मन ही मन घबराती है। नारी को वस्तु बतलाने का जतन रोज होता जाता है। स्त्री पूजा वाली संस्कृति का पतन रोज होता जाता है। जहाँ द्रोपदी के चीर हरण पर महाभारत हो जाती थी। और सीता के अपहरण पर लंका गारत हो जाती थी। जहाँ पद्मावती न दिखलाने को रतनसिंह अड़ जाते थे। अस्मिता की रक्षा खातिर खिलजी से लड़ जाते थे। उस भारत में ये हाल कि दुष्कर्मियों का राज हुआ। बेटी मार लटकाने वालों के सिर मुखिया का ताज हुआ। नेताओं को परोसी बेटी मुट्ठी कस कर रह जाती है। लोकलाज के नाम सारे कुकृत्यों को सह जाती है। ऐसे हालातों में भी प्रशासन कुछ नहीं कर पाता है। इन लोगों का रौ...

Vijay : The Street Child (Story of an Orphan Boy)

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छुट्टियों में कुछ नया करने का जोश, अनाथ विजय की कहानी, 80 रूपए की डिजिटल कैसेट, दोस्त के दोस्त से उधार लिया कैमरा, एंड्राॅईड में रिकार्ड की गई आवाज और घर पर की गई एडिटिंग। कुछ इस तरह बनी यह शाॅर्ट फिल्म। अपनी तरफ से पहला प्रयास था तो ज्यादा उम्मीदें तो मैंने रखी नहीं थी। खैर, जैसी भी बनी है, आपके सामने है। देखिए, राय दीजिए, अच्छी लगे तो शेयर भी कीजिए। शायद किसी के दिल पर असर कर जाए। :)

बागी होती बंदूकें

कैसे गाऊँ जैजैवन्ती,दरबारी और मल्हार को। कैसे गाऊँ बसंत बहारें, कैसे गाऊँ श्रृंगार को। यहां गांवों में रोते दिखते झुग्गी छप्पर झोंपड़ियाँ। सूखे कांटे जैसे चेहरे, भूख से ऐंठी अंतड़ियाँ।। पेड़ पर लटकी लाशें दिखती भूमिपुत्र किसानों की। एक तिहाई जनता भूखी, मोहताज दानें दानों की। दूर देशों में छुपाई जाती कालेधन की संदूकें। इन्हीं कारणों से वतन में बागी होती बंदूकें। ऐसे हालातों में शब्दों में प्रीत नहीं ला सकता मैं। शोकसभा में श्रृंगार के गीत नहीं गा सकता मैं।। मैंने भारत माता के दिल के छाले देखें हैं। बुद्धिजीवियों की जुबान पर लटके ताले देखें है। मैंने सिंहासन दरबारों को निष्ठुर होते देखा है। वीर शहीदों की रूहों को छुप छुप रोते देखा है। जहर बोती सियासत की कैसे मैं जय कार करूं। हत्यारों को सिंहासन पर कैसे मैं स्वीकार करूं। मैं युवाओं को इंकलाब की राग सिखाता जाऊँगा। धवल खादी के दामन के दाग दिखाता जाऊँगा। देशद्रोहियों के वंदन की रीत नहीं ला सकता मैं। शोकसभा में श्रृंगार के गीत नहीं गा सकता मैं। >> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"

अब इंकलाब जरूरी है

चीख चीख रोता है मेरा दिल भारत के हालातों पर। मेरी कलम नहीं लिख पाती गीत प्रेम मुलाकातों पर। मैंने भारत माता को अक्सर रोते हुए देखा है। और वतन की सरकारों को सोते हुए देखा है। सरकारें जो पूरे भारत वर्ष की भाग्य विधाता है। सरकारें जो संविधान की रक्षक और निर्माता है। सरकारें जो वतन की हिफाजत खातिर बुनी गई। सरकारें जो जनता हेतु जनता द्वारा चुनी गई। सरकारें जो संरक्षक है देश में लोकतंत्र की। सरकारें जो शिक्षक है कत्र्तव्यों के मंत्र की। सरकारें जो जनता के सेवक का पर्याय है। सरकारें जो उम्मीद है, आशा है, न्याय है। सरकारें जो परिभाषा है वतन के विकास की। सरकारें जो अहसास है भरोसे और विश्वास की। सरकारें जो सच्चाई और देशप्रेम की मिसाल है। सरकारें जो अराजक लोगों के लिए महाकाल है। आज वतन में वही सरकारें गुण्डागर्दी करती है। रक्षक ही भक्षक बन बैठे, जनता इनसे डरती है। खादी और खाकी दोनों ही अब मर्यादा से दूर हुए। चरित्रहीन नेता बन बैठे ,दौलत के नशे में चूर हुए। जो नेता संसद में देश की इज्जत उछाला करते है। और देश की आंखो में अक्सर मिर्च डाला करते है। भोले भाले लोग यहां के भा...

अब इंकलाब जरूरी है

सिसक सिसक कर रो रही है मेरी भारत माता आज। बिलख बिलख कर रो रहे हैं संविधान निर्माता आज। तड़प तड़प कर रोता होगा गांधी सुभाष का दिल भी आज। चीख चीख कर रोते होंगे भगतसिंह,बिस्मिल भी आज। रोती होगी गंगा जमना,रोते कश्मीर-हिमालय आज। रोते होंगे मंदिर मस्जिद,रोते सभी देवालय आज। रोती होगी कन्याकुमारी,रो रही गौहाटी आज। रो रहा है मरू प्रदेश भी,रो रही चैपाटी आज। आज देश में चारों ओर गुण्डों का प्रशासन है। और जूती की नोक पर पड़ा हुआ अनुशासन है। आज शास्त्री की पीठ में छुरी भोंक दी जाती है। और संसद की आंखो में मिर्च झोंक दी जाती है। बहुत सह लिया हम लोगों ने, अब बदलाव जरूरी है। चुप रहने से काम न चलेगा, अब इंकलाब जरूरी है। आज संसद चला रहे है गुण्डे तस्कर और डाकू। हाथापाई, मारपीट, छीनाझपट्टी और चाकू। कोई स्पीकर की टेबल का माईक उखाड़ चला जाता है। और सदन की सम्पत्ति के कागज फाड़ चला जाता है। संसद स्थगित करने को अब बहाने बनाए जाते है। पानी की तरह जनता के रूपए बहाए जाते है। राजनेता बर्बाद कर रहे है मेरे भारत देश को। और बदनाम किया जा रहा है खादी वाले वेश को। आज वतन के लोग यहां के नेताओं से त्रस्त है। लेकिन युवा पीढी...

यादें

पिछली पोस्ट पर बहुत बड़े बड़े ब्लागरों के कमेण्ट प्राप्त हुए तो दिल में कुछ और नया लिखने की इच्छा जगी। तो कल रात को एक छोटी सी कविता और लिखी अब ये तो पता नहीं कि इसे क्या कहते है। कहीं से सुना था कि ये कुण्डली है खैर जो भी हो जो दिल में आया लिख दिया देखकर बताइएगा कैसी लगी पोस्टकार्ड का गया जमाना, बीती बातें तार की। फैक्स हुआ ओल्ड फैशन, टेलीफोन चीज बेकार की।। टेलीफोन चीज बेकार की, मोबाईल क्या आया। कैमरा, टार्च और अलार्म, सब का हुआ सफाया।। सब का हुआ सफाया, घड़ी पता नहीं कहां खोई। कैसेट बिचारी बैठ के, बंद कमरे में रोई।। बंद कमरे मे रोई, टेप रिकार्डर अब कौन बजाए। रेडियो के आगे बैठ कर, अब महफिल कौन सजाए।। अब महफिल कौन सजाए, चीजें आई जब नई नई। कौन जाने और क्यों जाने, टेलीफोन डायरी कहां गई।। ‘लक्ष्य’ जमाना बदल रहा, अब बस यादें रह जाएगी। कभी चुपके से कानों में, जो अपनी कहानी कह जाएगी।। -लक्ष्मण बिश्नोई और अब अपडेट समीर लाल जी समीर ने इस कविता को सम्पादित करके कुछ यूँ शुद्ध कुंडली का रूप दिया पोस्टकार्ड का गया जमाना, बीती बातें तार की। फैक्स पुरानी बात हो गया, फोन चीज बेकार की।। फ...

बापू

एक बापू गांधी थे, दूजे बापू आप। वो सत्य अहिंसा के साधक, आप पाप के बाप।। आप पाप के बाप, शर्म लज्जा सब खो गई। हे राम की वाणी अब, हाय राम हो गई।। हाय राम हो गई, ढोंगी हुए सब महात्मा। अधर्म पैर पसारता, धर्म का हुआ खात्मा।। धर्म का हुआ खात्मा, वासना चारों ओर। मुख में हरि ओम जपते, मन में बैठा चोर।। मन में बैठा चोर, रावण को देते टक्कर। जर जोरू और जमीन के रोज चलते चक्कर।। कहता लक्ष्मण बात यह, यही सबसे बड़ा रोग। ऐसे ढोंगी बाबाओं को, फिर भी पूजते लोग।।