शनिवार, 7 अप्रैल 2018

Stop Glorifying Criminals and Idiots


Dear media,
Please,
Stop Glorifying Criminals and Idiots!
अपराधियों का और मूर्खों का महिमामंडन बन्द किया जाए।

"सलमान की फैन ने दो दिन से खाना नहीं खाया"
"सलमान के प्रशंसकों का रो रो कर बुरा हाल"
Seriously ?
ये भारत के नेशनल मीडिया की हेडलाइंस होनी चाहिए ?
ऐसे तो राम रहीम के चेले सर मुंडवा कर बैठ गए थे।
आसाराम के फैन हर पेशी के बाद उसकी गाड़ी के टायरों के निशान चूमते रहते हैं।
लेकिन ये उन लोगों की मूर्खता है।
इस का महिमामंडन करने की क्या आवश्यकता है ?

"सलमान के लिए प्रार्थनाओं का दौर जारी"
"सोशल मीडिया पर दुआ कर रहे हैं लोग"
मीडिया इस तरह से दिखा रहा है जैसे सलमान के साथ बहुत बड़ी ज्यादती हो गई हो, ज़ुल्म हो गया हो।
उसने अपराध किया है, भुगतेगा! सीधी सी बात है।

"राखी सावंत ने कहा- सलमान को फंसाया गया है"
"एजाज खान ने कहा- किसी और का पाप ढ़ो रहे हैं सलमान"
सलमान ने शिकार किया या नहीं, ये तय करना कोर्ट का काम है, इन फुटेज के भूखे लोगों का नहीं।
ad verecundiam fallacy बन्द हो। चमचों के कह देने से "भाई" निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता।

"फरिश्ते से कम नहीं है सलमान"
"सलमान करते हैं इतना पैसा दान"
"सलमान ने बीइंग ह्यूमन से बचाई इतनी जानें"
Okay, मैं 50 लोगों के दिल के ऑपरेशन के पैसे भरने के लिए तैयार हूँ, मुझे इन टीवी चैनल्स के सम्पादकों पर गाड़ी चढ़ाने की अनुमति दी जाए।
बीइंग ह्यूमन की टैगलाइन "नौ सौ चूहे खा बिल्ली हज को चली" है। और कुछ नहीं।
पहली बात, ये पश्चाताप नहीं है, दिखावा है।
पश्चाताप तब कहा जाता है, जब गलती स्वीकार की जाए, यहां तो सिद्ध किया जा रहा है कि गाड़ी ड्राइवर चला रहा था।
और पश्चाताप हो, तो भी करते रहिए। कानून में जो दण्ड है, वो तो भुगतना ही पड़ेगा।
दूसरी बात ये बैड बॉय की इमेज सुधारने का प्रयास है और इस फसल को वकील बाक़ायदा कोर्ट में काटते हैं कि "मेरा मुवक्किल ये काम भी करता है, इसलिए सजा कम की जाए, जमानत दी जाए"

आपको सलमान के नाम पर टीआरपी बढ़ानी ही है, तो दिखाइए कि उसे घुटनों पर लाने वाले लोग कौन हैं। कौन लोग हैं जो ना झुके, ना बिके।
दिखाइए कि किस तरह हिट एंड रन केस के गवाह रविन्द्र पटेल की किन परिस्थितियों में मौत हो गई।
दिखाइए कि आर्म्स एक्ट के पिछले मुकदमों का किस तरह अदालतों में मज़ाक बनाया गया था।
लेकिन आप नहीं दिखाएंगे, क्योंकि इससे आप के स्वार्थ पूरे नहीं होते।

विडम्बना है कि आप जो भी दिखाएंगे, लोगों को देखना पड़ेगा। विकल्प ही नहीं है।
इसलिए, लगे रहिए।
लेकिन ख़ुद को पत्रकार कहना बन्द कर दीजिए।
क्योंकि पत्रकार का काम ये बताना नहीं होता कि जेल में बंद एक पोचर ने रात में टॉयलेट कितने बजे यूज़ की थी।

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