शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

खेजड़ली बलिदान कथा

अरे! जब राजमहल बन रहा है और उसका चूना पकाने के लिए लकड़ियाँ चाहिए, तो राजा अपने राज्य में चाहे जहां से लकड़ी कटवाए! बिश्नोई कौन होते हैं रोकने वाले ?
दीवान गिरधरदास ने राजा अभयसिंह को उसकी शक्तियाँ याद दिलाई।
राजा असमंजस में खड़ा रहा!
दीवान ने उसे अपनी युक्तियों पर विश्वास करने को कहा। बिश्नोईयों को डराने धमकाने के लिए सेना साथ ले जाने की अनुमति मांगी और फिर से खेजड़ली की ओर चला आया।
दीवान दो दिन पहले भी आया था। तब उसने कहा था कि अगर गांव के लोग मिल कर उसे कुछ पैसे दे देते हैं तो वो लकड़ियों की व्यवस्था कहीं और से कर लेगा।
दीवान को लगा कि अपने पेड़ बचाने के लिए गांव वाले उसे इतनी सी भेंट तो चढ़ा ही देंगे।
लेकिन गांव वालों के लिए तो ये सिद्धांतों का संघर्ष था। सिद्धांतों के संघर्ष में साध्य और साधन दोनों की पवित्रता बने रहना अनिवार्य होता है। ऐसे में खेजड़ली गांव की ही एक बिश्नोई नारी अमृता ने आगे बढ़ दीवान को दो टूक जवाब दे दिया-
दाम दिया दाग लगे, टको नी देवां डाँण।
रिश्वत क्यों दें ? रिश्वत के लिए एक टका भी नहीं मिलेगा!
दीवान भड़क उठा। राजपुरुष होने की धौंस जमाई और सबक सिखाने की धमकी दे वापिस चला गया। कहा- दशमी को सेना सहित आऊंगा। देखता हूँ कैसे बचा लोगे वृक्ष!
कहाँ जोधपुर रियासत का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति दीवान और कहाँ ढ़ाणियों में रहने वाले निर्बल और शक्तिहीन बिश्नोई!
लेकिन धर्म का बल धनबल और बाहुबल से बहुत अधिक होता है। बिश्नोई लोग अपने आदर्शों के लिए लड़ रहे थे। इसलिए उन्हें डर लगा ही नहीं। चिंता जरूर हुई, पर वो भी अपनी नहीं, वृक्षों की।
शमी वृक्ष मरुभूमि का कल्प वृक्ष कहा जाता है। आर्थिक दृष्टि से लाभदायक। धार्मिक महत्व भी अत्यधिक। "शमी शमयते पापं" "रामस्य प्रियवादिनी" "अमंगलानां शमनीं"। बिश्नोईयों के लिए तो खेजड़ी माँ है, बहन है, बेटी है। खेजड़ा पितृवत है, भ्रातृवत है, मित्रवत है, पुत्रवत है। उसे कोई चूना पकाने के लिए काट ले जाएगा ?
84 गांव खेड़ों में सन्देश भेजा गया- दीवान दशमी को सेना सहित आने की धमकी दे गया है। पेड़ काटेगा। उसे येन केन प्रकरेण रोकना है।
लोग नवमी की शाम को ही पहुंचने लगे थे। रात्रि जागरण हुआ। दशमी की सुबह हवन हुआ। सबदवाणी का पाठ हुआ। धर्म-नियम-संकल्प दोहराए गए। खेजड़ी तो बचानी ही है। हर हाल में। चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए।
उधर दीवान नवमी की रात निश्चिन्त सोया और दशमी को सुबह होते ही सेना सहित चल पड़ा। आरे-कुल्हाड़े साथ लिए। बैल-घोड़े-गाड़ियाँ। पेड़ काट कर ले कर ही आना है। हर हाल में। चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए।
खेजड़ली गांव में प्रवेश करते ही दीवान को सामने सहस्रों बिश्नोईयों का समूह दिखा। बिश्नोईजन हवनादि अनुष्ठान संपन्न कर दीवान की प्रतीक्षा में ही बैठे थे। शत्रु को सम्मुख देख उठ खड़े हुए। लेकिन साथ ही राजपुरुष आया जान अभिवादन भी किया। गुरु जाम्भोजी का कहा सबद है- " जे कोई आवे हो हो कर तो आप जे हुईए पाणी "। बिश्नोई जनों ने ऐसा ही किया। हाथ जोड़ खेजड़ी के वृक्षों के समीप मानव श्रृंखला बना दीवान के समक्ष खड़े हो गए।
दीवान ने उपेक्षापूर्वक सरसरी तौर पर नजर डाली,घोड़ा आगे बढ़ाया और एक घने बड़े खेजड़े की छांव में रुक गया।
अनगिनत बार भिड़ चुकने के बाद भी अधर्म फिर से धर्म के समक्ष संघर्ष को प्रस्तुत था। सदा की तरह- धर्म शांत, नम्र लेकिन उन्नत माथा लिए और अधर्म अट्टाहास करता हुआ।
दीवान ने देखा- रिश्वत की मांग पर अपमानित करने वाली नारी अमृता सबसे आगे खड़ी है। दीवान प्रतिशोध के भाव ले कर तो आया ही था, इसे चुनौती समझ और अधिक चिढ़ गया।
उसने सिपाहियों को कुल्हाड़ी ले आगे आने को कहा और सबसे पहले अमृता के समीप के खेजड़े को काट गिराने का हुक्म दे दिया।
अमृता के मन में झंझावात चल उठे।
उसने कातर दृष्टि से खेजड़े की ओर देखा और हाथ जोड़े हुए ही दो कदम आगे बढ़ आई।
मद में चूर दीवान बोला- अगर उस दिन पैसे दे दिए होते तो आज ये दिन न देखना पड़ता। अब तो सारे पेड़ कटेंगे।
देखता हूँ मुझे कौन कैसे रोकता है!
सिपाही आगे बढ़ा और कुल्हाड़ा तान खड़ा हो गया।
सुख दुःख के साथी खेजड़े पर तना कुल्हाड़ा देख अमृता का गला भर आया। आंखों से अश्रुधार बही। कुछ सम्भली, फिर बोली- दीवान जी, ये खेजड़ियाँ हमारे जीवन का आसरा है। इन्हीं की सूखी समिधाएँ बीन कर चूल्हा जलाया, इन की सांगरियों के साग से हम दोपायों का और लूंग से चौपायों का पेट भरा, हर चौमासे की दोपहरी में उस घने खेजड़े की छांव में भरतार के साथ भाता किया, मुश्किल से महीना बीता होगा - अब के सावन में ही इस बांकी खेजड़ी की झुकी डाल पर झूला झूली, ये सब मैं कैसे भूलूँ ?
दीवान उपहास की दृष्टि से देखता रहा।
अमृता का स्वर शनैः शनैः आरोहित हुआ-
मैंने तो छोटी अंगुली के नख से भी कभी इनकी छाल तक न उतारी, तुम कहते हो काट ले जाऊंगा!
ये वृक्ष मेरे भाई हैं। मैंने अपना पूरा जीवन इन के संग जिया है। मैं अपनी आँखों से इनका संहार नहीं देख सकती। तुम इन वृक्षों को अवश्य काट लेना, परन्तु- पहले कुल्हाड़ी मेरे ऊपर चलेगी, पश्चात पेड़ों पर।
इतना कह अमृता ने आंखें बंद की, अपने गुरु को स्मरण किया, आगे बढ़ी और उस बड़े 'भाई' को भुजाओं में भर कर खड़ी हो गई।
भादो का महीना था, घेरा बनाए बादल हौले हौले रिसने लगे। मेह में भीग कर झूम जाने वाली खेजड़ियाँ आज भय से कांप उठी। पेड़ों ने साँय साँय कर अनिष्ट की आशंकाओं के संदेश इक दूजे तक पहुंचाए।
दीवान अट्टाहास कर बोला- री मूर्ख! रूंख के लिए सर कटाएगी ?
शांत स्वर में उत्तर मिला- सर साँटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण!
सिर कट जाए और वृक्ष बच जाए तो भी सस्ता ही सौदा है!
दीवान इस दिव्यता को सह नहीं पाया और मस्तिष्क पर तीव्र आघात से पागल हुए हाथी की तरह चीख उठा। बोला- काट डालो इसे!
सिपाही ठिठक गया। दीवान फिर चीखा- रे खड़ा क्यों है, हुकुम बजा, काट दे इस मूर्खा को! ये मुझे रोकेगी ?
चला कुल्हाड़ी और काट डाल !
आदेश की पालना हो गई!
वफादार सैनिक की कुल्हाड़ी ने सीधे गर्दन पर वार किया। अमृता का सिर कट कर धरती माँ की गोद में जा गिरा। उसके धन्य कबन्ध से लोहित की एक तीव्र धार फूटी और लोहितकण्टका शमी का अभिषेक करती हुई शांत हो गई।
इस घटना से पूर्व भी बिश्नोई समाज में वृक्ष रक्षा हेतु तीन खड़ाणे हो चुके थे। 6 लोग अपने प्राण पर्यावरण को अर्पित कर चुके थे। उनकी कथाएं सुन सुन बड़ी हुई बिश्नोईयों की उस पीढ़ी ने बलिदान का अवसर समक्ष पा स्वयं को धन्य समझा। गुरु जम्भेश्वर, आराध्य देव विष्णु और अमृता देवी की जय जयकार होने लगी। सर साँटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण के नारों से रोंए खड़े होते थे।
अमृता की तीन बेटियाँ- आसी, रतनी और भागू आगे बढ़ी और वृक्ष रक्षा हित मां के पद चिह्नों पर चल पड़ी। निर्दयी कुल्हाड़े के प्रहार से बच्चियों के सुकोमल अंग छिन्न भिन्न हो भूशायी हुए। उनके पिता, अमृता के पति रामोजी की देह भी कुठाराघात से निष्प्राण हुई।
फिर तो जैसे हरीतिमा शमी को लहू से सींचने की होड़ लग गई। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री, क्या पुरुष! जय जय कार किये आते थे और वृक्षों को बांहों में जकड़ कर खड़े हो जाते थे। रक्त पिपासु दीवान हतप्रभ चीखता जाता था, सिपाही यंत्रवत आघात किये जाते थे और मुख पर सौम्य स्मिता धारण किये बिश्नोईजन कटते जाते थे।
एक युवक पहली बार पत्नी को मायके से ले आ रहा था। वो भी सपत्नीक पर्यावरण रक्षा के यज्ञ में आहूत हुआ। आबालवृद्ध। नर नारी। कुल 294 पुरुष और 69 महिलाएं बलिदान हुए। 363 मनुष्य !!
हा! कैसा विकट दृश्य। मरुधरा पर मनुज के गाढ़े लहू की सरिता बहती थी। लोथों से मैदान पटा पड़ा था। लेकिन "जांडी हिरण संहार देख सिर दीजिये" जैसी पंक्तियां गाने वाले इन भावों को जी बैठे तो क्या ही आश्चर्य!
चतुर्दिक या तो कटे हुए बिश्नोई दृष्टिगोचर होते या कटने को तत्पर बिश्नोई।
तब तक भूमि पर बहते रुधिर में अपना रक्तरंजित प्रतिबिम्ब देख सिपाही सिहर उठे। अंदर का राम जग गया। और अधिक हत्याएं करने का साहस नहीं रहा। पश्चाताप की ज्वाला में झुलस रहे सैनिकों ने कुल्हाड़े-कुल्हाड़ी फेंक दिए। घुटने टेक बैठ कर रोने लगे।
सिपाहियों के प्रतिरोध करते ही दीवान भी डर गया। घोड़े को ले जोधपुर की ओर भागा। लेकिन महाभारत काल में अर्जुन के बाणों को धारण करने वाली "धारिण्यर्जुन बाणानां" शमी अपने प्रियजनों के संहारक को भला बच कर कैसे जाने देती। दीवान का घोड़ा खेजड़ी से टकरा गया और दीवान विक्षिप्त हो यमलोक को प्राप्त हुआ।
अगले दिन अभयसिंह तक इस नरसंहार का संदेश पहुंचा। जाम्भोजी के अनन्य भक्त जोधे के जोधपुर में ऐसा अनर्थ ! दीवान के बहकावे में आ वृक्ष काटने का आदेश देने वाले राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ। भागा भागा खेजड़ली आया। उपस्थित पंचों के पगों में पगड़ी रखी, हाथ जोड़े, माफी मांगी और सरकार की ओर से लिखित में ताम्रपत्र दिया कि भविष्य में जोधपुर राज्य में हरे वृक्ष नहीं काटे जाएंगे।
वर्तमान में भारत में केंद्र एवं राज्य सरकारें पर्यावरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को अमृता देवी स्मृति पर्यावरण पुरस्कार भी प्रदान करती हैं।
खेजड़ली में उस बलिदान स्थल पर उन पर्यावरण योद्धाओं की स्मृति में स्मारक बना हुआ है। प्रति वर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को उनकी पुण्य स्मृति में मेला भरता है। जहां बिश्नोई समाज के लोग अपने पितृ पुरुषों को श्रद्धांजलि देते हुए अपने संकल्पों को दोहराते हैं।
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आइए, आज खेजड़ली बलिदान दिवस पर हम सब पर्यावरण की बेहतरी के लिए वृक्षारोपण, वृक्ष संवर्द्धन और वृक्ष संरक्षण का संकल्प लें। यही हमारी ओर से उन विश्व नायक पर्यावरण ऋषियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बुधवार, 9 अगस्त 2017

हृदयहीनता की पराकाष्ठा

आशा साहनी।
वही अभागी मां, मुम्बई के लोखंडवाला से कल जिसका कंकाल बरामद हुआ है।
अमेरिका में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटे की उससे अंतिम बार फोन पर बात अप्रैल 2016 में हुई थी। अकेले रह कर टूट चुकी बूढ़ी मां फोन पर रोई और बेटे से कहा कि अब अकेले रहा नहीं जाता। कहीं कोई वृद्धाश्रम तलाश करुँगी और वहीं रहूँगी। नाराज थी, गुस्से में थी तो कह दिया होगा कि आईंदा मुझे फोन मत करना और 'आज्ञाकारी' बेटे ने सचमुच सवा साल तक खबर ही न ली! बेटे को सवा साल से मालूम ही नहीं कि उसे जन्म देने वाली माँ किस हाल में है, जिंदा भी है कि मर गई।
हृदय हीनता की पराकाष्ठा! इसी बेटे के जन्म पर उस माँ ने उत्सव मनाया होगा।
बेटे ने कर्त्तव्य निर्वहन के नाम पर पैसे जरूर भेजे थे, कंकाल के सिरहाने 50 हजार रुपये पड़े मिले हैं। लेकिन माँ दौलत कब चाहती है। उसकी दौलत तो बेटा हुआ करता है।
ये माँ तो इतनी अभागी रही कि उसका बेटा दौलत को ही माँ मान बैठा।
और, सोसायटी के लोग ? पड़ोसी ?
निष्ठुर! निर्मम! तटस्थ ! बेटे को एक बार ई मेल किया था क्योंकि सोसायटी के रख रखाव के खर्चे के पैसे बुढ़िया ने 6-7 महीनों से भरे नहीं थे। कंकाल बिचारा भरता भी तो कैसे ? पैसों की चिंता तो हुई, लेकिन ये चिंता नहीं हुई कि दिन महीनों से घर का दरवाजा नहीं खुला है, कहीं कुछ गलत तो नहीं हुआ होगा !
लाश को कंकाल बनने में कम से कम 4 या 5 महीने लगते हैं। मतलब वृद्धा की मौत इससे पहले ही हुई है। खिड़की खुली थी, अपार्टमेंट में अच्छी हवा आ रही थी, इसलिए दुर्गंध फैली नहीं और जब तक हमारे नाक को कोई परेशानी न हो, तब तक हम क्यों परवाह करने लगे।
आलीशान फ्लैट के आरामदायक बेड पर पूरे कपड़े पहने पड़ा वो कंकाल या हड्डियों का ढांचा डरावना नहीं है। डरावना है- हम लोगों का इस तरह हृदय हीन - संवेदन हीन हो जाना।
हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी ?
महानगरीय सभ्यता का प्रभाव नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का क्षय न करे और आपको आशा साहनी की मानिंद न मरना पड़े, इसके लिए अपनी अगली पीढ़ी सम्भाल लीजिए।
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कल समाजशास्त्र की कोई किताब पढ़ रहा था। नगरीकरण के इतिहास में नगरों के उद् विकास का क्रम ना जाने क्यों कुछ संकेत देता सा जान पड़ता है।
कस्बे (इकमेनोपॉलिस) से नगर (पॉलिस), नगर (पॉलिस) से महानगर (मेट्रोपॉलिस), महानगर (मेट्रोपॉलिस) से अति महा नगर (मेगालोपॉलिस)।
यहाँ तक हम पहुंच चुके हैं।
समाज एवं शासन में नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का क्षय होते रहने से अति महानगर (मेगालोपॉलिस) बनता है- उत्पीड़क नगर (टायरनोपॉलिस)।
और इससे आगे ?
अंत !
नेक्रोपॉलिस !
मुर्दों का नगर!


मंगलवार, 8 अगस्त 2017

रक्षाबंधन विशेष - मायरो

बीरा बणजे तू जायल रो जाट,
बणजे खिंयाला रो चौधरी।
कथा लगभग छह सात सौ साल पहले की यानि कि सल्तनत काल की है और यूं है कि नागौर में दो चौधरी हुआ करते थे। नाम था गोपाल जी और धर्मो जी। गोपाल जी जायल गांव के बासट गोत के जाट और धर्मो जी खिंयाला के बिडियासर । दोनों चौधरी उस समय के पटवारी के पद पर थे। दिल्ली के सुल्तानों के लिए लगान संग्रहण करने का कार्य किया करते थे और ये काम वो दोनों कई सालों से किया करते थे। क्योंकि सुल्तान बदल जाया करते हैं, पटवारी नहीं बदला करते।
दोनों चौधरी साल में एक बार किसानों से निर्धारित रकम वसूला करते, जो भी सुल्तान गद्दी पर होता, उस तक पहुंचा दिया करते और अपनी तनख्वाह ले लिया करते।
इस बार हुआ यूं कि सुल्तान ने लगान बढ़ा दिया। कारण क्या रहा, मुझे नहीं मालूम। कोई नई लड़ाई छेड़ बैठा होगा, कोई नई खुराफात सूझी होगी या कोई नई शादी की मन में आ गई होगी।
दिल्ली की जायज नाजायज मांगे दूर कहीं खेतों में खप रहा किसान हमेशा से ही आंखे मींच पूरी करता रहा है।
खैर, कारण जो भी रहा हो, कहानी को इस बात से मतलब है कि चौधरियों को दुगुने पैसे ले कर जल्दी से जल्दी वहां पहुंचने के लिए पाबन्द किया गया था।
तो नागौरी चौधरी भागे, दौड़े, माया इकट्ठी की और ऊंटों पर रकम बांध कर सुल्तान को सौंप देने दिल्ली के लिए तैयार हुए।
सूर्योदय से पहले,जायल में बने गोपाल जी के घर से दोनों साथी ऊंटों पर सवार हो कर निकले और शाम ढलने के बाद 7-8 बजे तक हरमाड़ा नाम के एक गांव तक पहुंचे। जायल से पचास साठ कोस दूर। जयपुर से थोड़ा सा पहले।
चूंकि दिन भर चलते चलते चौपाए और दोपाए दोनों थक चुके थे, इसलिए हरमाड़ा गांव की कांकड़ में कुंए के पास चौधरियों ने डेरा जमाया, ऊंटों को चारा पानी किया और खुद सन्ध्या पूजा कर भोजन करने बैठे।
उसी गांव की गुर्जर जाति की एक सामान्य सी गृहिणी, लिछमा, उस समय अपनी पुत्री के परिणय उत्सव के प्रबंध में लगी थी। लेकिन विवाह के उत्साह से बिल्कुल परे। आकुल, व्याकुल, दुविधाग्रस्त और कारण ये था कि उसके पीहर (मायके) में कोई था नहीं जो उसकी पुत्री के विवाह में भात भरने के लिए आ सके।
भात या मायरे की प्रथा में विवाह के सुअवसर पर मातुल पक्ष के लोग कुछ उपहार ले कर प्रस्तुत होते हैं। ये उपहार सामान्यतः वस्त्र,आभूषण या नकदी के रूप में होते हैं। सामर्थ्य श्रद्धा अनुसार।
लेकिन उपहार और सहायता के नाम पर चली ये परम्परा प्रतिष्ठा का प्रश्न बनते हुए मध्यकाल में महिलाओं के लिए गले की फांस बन गयी थी।
जब तक मायके से मायरा आ न जाए (अच्छे भले उपहारों के साथ), तब तक ना तो नारी चिंता मुक्त हो पाती थी और ना ही कुल कुटुम्ब उसे चैन से सांस लेने ही देता था। भात में कितने पैसे आए, कौन कौन से आभूषण आए, किस भाँति के वस्त्र आए इत्यादि प्रश्नों के उत्तर आने वाले कई दिन-महीनों-सालों तक ससुराल में नारी की प्रतिष्ठा और महत्त्व को निर्धारित करते थे। भात कम आने का अर्थ ही जहाँ जीवन भर सास-ननद, देवरानी-जेठानी आदि के ताने हुआ करता हो, वहाँ भात नहीं आने पर क्या हाल हो सकता है, कल्पना सहज ही की जा सकती है।
अब, अगले दिन विवाह का कार्यक्रम निश्चित था। घर भर में उत्सव का उत्साह और उमंग। जेठानी और देवरानी की पुत्रियों का भी विवाह था। उनका भी भात कल ही आना था, वे दोनों अपने अपने पिता-भाई और भात के स्वागत का प्रबंध कर रही थीं।
ऐसे में लिछमा स्वयं को दुर्भाग्यशाली न समझे तो क्या करे, पिता संसार छोड़ कर चल बसे थे, सगा भाई कोई था नहीं। मां के जाए बीर बिना कुण भात भरण ने आवे! आंसू आंखों की कोर में तैर रहे थे, छलके नहीं, क्योंकि अभी तक इस प्रसंग पर चर्चा हुई नहीं थी। लिछमा को लगा- मेरे मायके की स्थिति सर्वज्ञात है, हो सकता है इसी से मुझे मायरे से मुक्ति दे दी गई हो।
लेकिन ऐसा थोड़े ही हुआ करता है। पंजाब में कहावत है- सांप में एक 'स', सास में दो 'स'। सास ये मौका ऐसे ही थोड़े छोड़ देने वाली थी। सास समुदाय की प्राचीन एवं प्रचलित परम्परा का पूर्ण रूपेण निर्वहन हुआ। खुल कर तिक्त वचन सुनाए गए।
भात बिना कोई विवाह हुआ है कभी जो तेरी बेटी का हो जाएगा, फूटे भाग हमारे जो तेरे जैसी बहु मिली, मर क्यों नहीं जाती कहीं जाकर!
अपमान के नमक से अंतर के घाव चिरमिरा उठे। लिछमा रोने लगी। मन में विचार आया-तिरस्कार सह कर जीने से तो अच्छा प्राण ही दे दिए जाएं। कौनसा सार बचा है जीवन में।
पनघट से पानी लाने का बहाना बनाया, घड़ा उठाया और रोते रोते चल पड़ी।
लिछमा पनघट पर बैठ के खुल के रोई, सोचा- मरना तो है ही, जी तो हल्का करूँ।
राम जाने विधाता ने कैसे भाग लिखे हैं, जो कोई मेरा भी भाई होता तो आज मरने की नौबत थोड़े ही आती।
भाग्य को भी लिछमा की तरह कोसा जाना सहन नहीं हुआ और उसने भी बदल जाने की ठान ली।
और भाग्यवश, दैव योग से ही, लिछमा का रुदन चौधरियों के कानों में पड़ा।
चौधरी भोजनादि से निवृत्त हो कर सोने की तैयारी कर रहे थे। रुदन सुन चौंके।  रात्रि का दूसरा प्रहर शुरू होने को है, ऐसे में पनघट पर स्त्री कण्ठ से रुदन की ध्वनि, यह कौन दुखियारी है।
दोनों में से एक उठा, लिछमा तक पहुंचा और बोला- री पणिहारी! रोती क्यों है, कौन विपत्ति आन पड़ी। मुझे बता, शायद मैं कुछ सहायता कर सकूँ।
लिछमा ने सोचा- इसे सुना कर ही क्यों न मरूँ, मरना तो है ही, जी तो हल्का हो।
लिछमा ने चौधरी को सब कुछ कह सुनाया।
चौधरी साहब व्यथा सुन व्याकुल हो गए, बोले- पणिहारी, कौन कहता है तेरा कोई भाई नहीं है,मुझे राखी बांध,मैं तेरा भाई हूँ।
लिछमा हिचकिचाई, चौधरी फिर बोला- लिछमा, चीर फाड़ के बांध कलाई पर, मैं तेरा धर्म का भाई हूँ। अब से तेरा सम्मान मेरा सम्मान। तेरी लाज मेरी लाज। तेरी व्यथा- मेरी व्यथा। भात की चिंता मत कर। भात मैं भरूँगा।
चौधरी की जबान थी, लिछमा आश्वस्त हो गई।
लिछमा के ओढ़नी के टुकड़े ने चौधरी की कलाई पर बन्ध कर भाई बहन के रिश्ते की नींव पड़ने की साख भरी।
गूजरी दुःख की घड़ी में भाई का सा स्नेह पा बड़ी प्रसन्न हुई और घड़ा उठा घर की ओर चली।
सास-ननद, जेठानी-देवरानी के पक्ष से विष बुझे वचन शरों का वर्षण जारी रहा। लेकिन लिछमा तो मन ही मन मुदित थी, प्रमुदित थी सो सब झेलती रही।
उधर, चौधरी ने दूसरे चौधरी को सारा वृत्तांत सुनाया और कहा- वचन दे आया हूँ, सुबह भात भरना है।
दूसरा चौधरी जबान की कीमत समझता था, भात भरने का कह दिया, मतलब भात तो भरना ही है।
लेकिन, पैसे कहाँ से आएं ? ऊंटों पर जो रकम लदी है, वो तो मालगुजारी के पैसे हैं। सुल्तान की अमानत। हिंदुस्तान की सरजमीं पर एकछत्र राज करने वाले बादशाह की अमानत और इस अमानत में खयानत करना यानि अपनी मौत खुद आमन्त्रित करना। रकम भी कोई छोटी मोटी नहीं थी, पूरी 22000 अशर्फियाँ। सैंकड़ो किसानों से वसूला गया कर। राजा ज़िंदा तो नहीं छोड़ेगा। ये तो तय है। क्या किया जाए।
लेकिन, जबान दे, फिर नट जाएं, इससे अच्छा तो यही कि कट जाएं। प्राण जाय पर वचन न जाई।
भात तो भरेंगे, बादशाह जो करेगा, देखा जाएगा।
चौधरियों ने खूंटों से बंधे ऊंटों को खोला, सवार हुए और घण्टे भर में जा पहुंचे जयपुर।
कुछ पुरानी पहचान का वास्ता दिया, कुछ पैसों का जोर दिखाया,आधी रात में दो चार दुकानें खुलवाई और मायरे के लिए उपहार, वस्त्र और आभूषण खरीद भोर होते होते पुनः हरमाड़ा पहुंच गए।
सुबह, जब बात गांव भर में फैली कि लिछमा के धर्म भाई आए हैं और भात भी भरा जाएगा तो इसे मजाक समझ देवरानी जेठानी ने मुंह बनाया। कल तक तो कोई भाई न था। अब कौन कृष्ण भगवान भात भरने आ रहे हैं।
लेकिन कलाई पर बंधे चीर ने फिर एक अद्भुत मुहूर्त की साख भरी। भाई ने बहन को गले लगाया, भात भरा और सम्मान की प्रतीक नौरंगी चूनरी ओढ़ाई। लिछमा ने मंगल गीत गाये। पूरे कुल कुटुम्ब के बीच लिछमा नौरंगी चूनरी ओढ़े खड़ी थी। भाव विह्वल। एक सूत्र की शक्ति, एक धागे की ताकत संसार देख रहा था। अज्ञात कुल, नाम, ग्राम की नारी, जिसे कल तक देखा तक न था, उसके हाथों रक्षा सूत्र बन्ध जाने के बाद, उसके सम्मान की रक्षा की खातिर चौधरी बादशाह तक को चुनौती दे बैठे।
भात में पूरे कुल कुटुम्ब में छोटे बड़े सब लोगों के लिए तरह तरह के वस्त्राभूषण सहित अन्य उपहार दिए गए। चौधरियों ने बहन और भानजी को शीशफूल से लेकर झांझर तक के आभूषणों से लाद दिया।सास-ननद, देवरानी- जेठानी ने भी अपना हिस्सा पाया।
इस तरह नेह सूत्र- रक्षा सूत्र से बंधे भाईयों ने बहन के सम्मान की रक्षा की और भात में दोनों ऊँटों सहित सारी माया लुटा, हाथ जोड़, चौधरी दिल्ली को निकल पड़े।
दो चार दिन बाद दिल्ली पहुंचे, दरबार में हाजरी लगाई। मालगुजारी जमा करवाने के वक़्त बादशाह के सम्मुख हाथ जोड़ खड़े हो गए। पूरा वृत्तांत कह सुनाया। मौत का भय तो था ही नहीं, मरना तो निश्चित मान के गए थे। लेकिन- "हिम्मत कीमत होय, बिन हिम्मत कीमत नहीं।" "कर भला तो हो भला।" बादशाह घटना सुन कर और चौधरियों की हिम्मत देख कर प्रभावित हो गया। उसने घटना की सत्यता जांचने का हुक्म दिया और सत्यता प्रमाणित होते ही दोनों चौधरियों को पुरस्कृत भी किया।
दोनों चौधरी सुल्तान के यहां से 1000 बीघा जमीन पुरस्कार में प्राप्त कर खुशी खुशी घर लौटे और हजार बीघा जमीन के साथ ही कमा लाए- हजारों वर्षों के लिए नाम। राजस्थान में आज तक बहनें अपने भाईयों से उन चौधरियों की तरह बनने को कहा करती है। वचन के पक्के, निडर, हिम्मती और दरियादिल। आज भी रक्षा बंधन के और भात के गीतों में ये पंक्तियां गाई जाती हैं-
"बीरा बणजे तू जायल रो जाट,
बणजे खिंयाला रो चौधरी।"
- लक्ष्मण बिश्नोई लक्ष्य

रविवार, 27 नवंबर 2016

मानव धर्म

नहीं आवश्यक परिक्रमा देवालयों के स्वर्णिम विग्रह की।
नहीं आवश्यक भक्ति साधना किसी कुपित क्रोधी ग्रह की।
नहीं आवश्यक है कि तुम तीर्थ यात्रा करते घूमो।
नहीं आवश्यक है कि तुम मस्जिदों की चौखट चूमो।
किसी धर्म ग्रन्थ का पाठ भी नहीं आवश्यक है कभी।
गंगा यमुना का घाट भी नहीं आवश्यक है कभी।
मानव हित में महान पुण्य, परोपकार का कर्म है।
भूखे को रोटी देना ही सच्चा मानव धर्म है।
----> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

सपनों को मरने मत देना

तेज आँधियों को दिये के,
प्राण कभी हरने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।

गगरी फूटी, नई बनाओ।
माला टूटी,फिर से सजाओ।
नन्हें कदम जब बढ़ना चाहें,
पकड़ अंगुली, हिम्मत बढ़ाओ।

चलना सीख रहे बच्चे को
गिरने से डरने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।

धूप नहीं,उजियारा देखो।
दुनिया से कुछ न्यारा देखो।
तूफानों से कांपे जगत जब,
पार कहीं किनारा देखो।

भँवरों से भी भिड़ जाने दो,
कश्ती खड़ी करने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।
----> लक्ष्मण बिश्नोई 'लक्ष्य'
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