रविवार, 27 नवंबर 2016

मानव धर्म

नहीं आवश्यक परिक्रमा देवालयों के स्वर्णिम विग्रह की।
नहीं आवश्यक भक्ति साधना किसी कुपित क्रोधी ग्रह की।
नहीं आवश्यक है कि तुम तीर्थ यात्रा करते घूमो।
नहीं आवश्यक है कि तुम मस्जिदों की चौखट चूमो।
किसी धर्म ग्रन्थ का पाठ भी नहीं आवश्यक है कभी।
गंगा यमुना का घाट भी नहीं आवश्यक है कभी।
मानव हित में महान पुण्य, परोपकार का कर्म है।
भूखे को रोटी देना ही सच्चा मानव धर्म है।
----> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

सपनों को मरने मत देना

तेज आँधियों को दिये के,
प्राण कभी हरने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।

गगरी फूटी, नई बनाओ।
माला टूटी,फिर से सजाओ।
नन्हें कदम जब बढ़ना चाहें,
पकड़ अंगुली, हिम्मत बढ़ाओ।

चलना सीख रहे बच्चे को
गिरने से डरने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।

धूप नहीं,उजियारा देखो।
दुनिया से कुछ न्यारा देखो।
तूफानों से कांपे जगत जब,
पार कहीं किनारा देखो।

भँवरों से भी भिड़ जाने दो,
कश्ती खड़ी करने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।
----> लक्ष्मण बिश्नोई 'लक्ष्य'

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

मेरे जीवन की हिस्सेदार हर नारी को समर्पित

जगती में जब मेरा जीवन,
आहत अकुलाए आघातों में।
क्लांत कलेजा कूक पड़े जब,
दु:ख की चुभती बरसातों में।
जब मन के प्रकाशित कोनों में,
स्याह अंधेरा जम जाए।
जब प्रगति पथ पर जीवन रथ,
खा हिचकोले, थम जाये।
उमंग भरी इन आँखों में मेरी,
यह दृश्य जो फिरा कभी-
शिखरों पर बैठा मैं, गर्त में
अभी गिरा,हाय!गिरा अभी
तब तुम आना, प्रेरक बनकर,
उम्मीदों की सौगात लिए।
तब तुम आना, प्रथम किरण सी,
मनमोहक प्रभात लिए।
तुम दीपक बनकर, मुझको, जग में
तम से लड़ना सिखला देना।
कर सारथ्य जीवन रथ का,
राह नई तुम दिखला देना।
मेरे तुम पर विश्वासों को,
साबित करना तुम सत्य सदा।
सफल पुरुष की शक्ति नारी,
सत्य रहे यह तथ्य सदा।।
---> लक्ष्मण बिश्नोई लक्ष्य

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

आओ वृक्ष लगाएं हम

प्रत्येक प्रसून-पत्र जिसके मानुष हित में न्यौछावर हैं,
जिसकी शाख प्रशाख तले छाया पाते यायावर हैं,
जिसके सुरभित कुसुम सदा ही मान बने, सम्मान बने।
जिसके होने से ही खेत बने खलिहान बने, उद्यान बने।

जिसने मनुज को प्राणवात सा जीने का आधार दिया,
जिसके झुरमुटों ने मां वसुधा के आंचल का श्रृंगार किया,
जिसकी छवि छटा ही मनमोहक और मतवाली है।
जिसकी शस्य श्यामल कांति मन को छूने वाली है।

जिसने नभचरों को निवास दिया,रहवास दिया।
फल-फूल दिए,उल्लास दिया,हुल्लास दिया।
अपने उत्पादों से पालन पोषण का विश्वास दिया।
उपकारों से समृद्ध सभ्यताओं का इतिहास दिया।

पुराण जिसके पत्र पत्र में विबुधों सा विश्वास जताते हैं,
मूल छाल और डाल डाल में त्रिमूर्ति का वास बताते हैं।
जिसके संवर्द्धन से दस पुत्रों के पालन सा पुण्य मिले,
जिसकी छांव तले जगत को दशमलव और शून्य मिले।

जिसकी छांव तले ही सनातन-बौद्ध-जैन-से पंथ बढ़े।
जिसकी छांव तले ऋषियों ने उपनिषदों-से ग्रंथ गढ़े।
बाईबिल जिसको परमेश्वर की अनुपम देन कहती है।
जिसे काटने की मनाही पैगम्बर के फरमानों में रहती है।

ऐसे हरे वृक्ष के सरंक्षण का उत्तरदायित्व हमारा है।
आओ वृक्ष संवर्द्धन करें कि मां प्रकृति ने पुकारा है।
नव पौधों को पल्लवित कर के कर्तव्यों को निभाएं हम।
मां वसुधा की आवाज सुनें,आओ वृक्ष लगाएं हम।

आओ वृक्ष लगाएं हम, आओ वृक्ष लगाएं हम।
-लक्ष्मण बिश्नोई 'लक्ष्य'

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

नव भारत

उमंग,उत्साह और स्फूर्ति,जन-जन में सृजित करें।
चलो युवानों, वीर जवानों ! नव भारत निर्मित करें।
हे मतवालों, हिम्मतवालों, नव भारत निर्मित करें।
विवेकानंद सा तप हमीं है,गुरू नानक सा जप हमीं है।
गांधी की अहिंसा भी हम हैं,प्रतिशोध की हिंसा भी हम हैं।
मीरा जैसी भक्ति हम हैं,हनुमान सी शक्ति हम हैं।
देवदत्त,पांचजन्य भी हम हैं,महाप्रभु चैतन्य भी हम हैं।
हम पतंजलि के योग ध्यान हैं,गौतम बुद्ध का कैवल्य ज्ञान हैं।
हम वीर शिवा-से बलशाली हैं,जगदम्बा,दुर्गा,महाकाली हैं।
कृष्ण कन्हैया लाल हमीं हैं,दशानन का काल हमीं हैं।
भगवद् गीता के ज्ञाता हम हैं,नव भारत निर्माता हम हैं।
आदर्श हमीं देते आए हैं,नाव हमीं खेते आए हैं।
फिर क्यों छा रही निराशा, उत्साह हीनता और हताशा।
क्यों सोए हो,निराश पड़े हो, हिम्मत करो, उठ खड़े हो।
पूरे करें स्वप्न तिलक के, कोई ना सोये रो बिलख के,
प्रताप शिवा सा स्वाभिमानी, बनें हर इक हिन्दुस्तानी।
बनें फिर से जगद्गुरू हम, गौरवमयी वर्तमान बनाएं।
गंगा जमुनी तहजीब वाला, प्यारा हिन्दुस्तान बनाएं।
उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में,अपना सर्वस्व अर्पित करें।
चलो युवानों, वीर जवानों!नव भारत निर्मित करें।
हे मतवालों, हिम्मतवालों, नव भारत निर्मित करें।
>> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"
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