उबासुते

 उबासुते

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एक जापानी दन्तकथा है - उबासुते का रिवाज़। बात उस जमाने की, जब हर दूजे-तीजे साल काळ पड़ा करता था। खेतों में परिवार का पेट भरने जितना धान भी न होता। गिनती के दाने होते, उसमें भी लाग-बाग का जोर अलग। ऐसे में समाज में उबासुते का रिवाज़ शुरू हुआ। जापानी भाषा में उबासुते का अर्थ- बुढ़िया से छुटकारा। 

बीमार होते ही या उमर का आंकड़ा सत्तर पार होते ही बेटे अपने माँ बाप को एक रात कंधे पर बाँध कर निकलते और दूर किसी पर्वत-पहाड़ पर पटक आते। बूढ़ी काया वहाँ या तो ठण्ड से ठर जाती, या कोई जंगली जिनावर तोड़ लेता, या गिद्ध ही नोंच खाते। 


जापान में यह किवदंती बहुत प्रचलित है। वहां जंगलों को उबासुते से जोड़ा गया। बड़े पहाड़ों को उबासुते यामा की संज्ञा दी गई। इसके घेरे कविताएं लिखी गई, उपन्यास रचे गए, चित्र कोरे गए, फिल्में भी बनाई गई।

लेकिन जापान में ऐसी कोई परम्परा रही हो, इतिहास के पोथी-पन्नों में इसके प्रमाण नहीं मिलते। अलबत्ता जापान तो अपने बुजुर्गों की देख रेख करने के लिए ही जाना जाता है। तब कौतुक की ही बात कि यह कहानी उसकी कल्पनाओं में क्यों कर आ गई। 


जवाब यह है कि यह कहानी हमारे भारत से चली। बौद्ध भिक्षुओं के साथ चीन होते हुए जापान पहुंची। वहाँ शायद सोच से भी परे की बात होने के कारण इतनी लोकप्रिय हुई।

किन्तु भारत में इस कहानी का कोण एकदम उल्टा रहा। जापान भले इसे सुनते ही कोसने लगा, हम हरदम इसके गुण गाते रहे।


काळ मारवाड़ में भी उतने ही गहरे पड़े। खेजड़ी की छाल कूट पेट भरने के दिन आए तो बडेरों को ताने मारे गए- काम के ना काज के, हिमाळे जा कर गल क्यों नहीं जाते। बडेरे गए तो पीछे से थान बना दिए गए। 

बंगाल की हजारों विधवाएं-वृद्धाएं वृन्दावन में ला कर पटक दी जाती रही हैं। जहां मरने पर कोई आग दिखाने वाला भी नहीं। कहने को राधा कहो, मीरा कहो।

तमिलनाडु में तो बेबस बुजुर्गों को सीधे मौत ही मिली। तलैकूथल से। कभी तैल स्नान से, कभी मिट्टी खिला कर तो कभी काँटों का घोल पिला कर। तिस पर तर्क मोक्ष का,आत्मा की शांति का।


अच्छी बात ये कि अब यह चश्मा काम नहीं करता। अब वृद्धाश्रम/विधवाश्रम में छोड़ आने को 'ग्रैनी डम्पिंग' माना जाता है, तलैकूथल को 'सेनिसाईड'। क़त्ल। इन सब की सामाजिक स्वीकार्यता घटने लगी है।


किन्तु बुरी बात ये कि महामारी की आपदा में लोगों ने उबासुते का बड़ा अवसर खोज लिया है। उबासुते-यामा बने हैं अस्पताल। कोविड वार्ड बीमार बुजुर्गों से भरे पड़े हैं, जिनका कोई धणी धोरी नहीं। श्मशानों में लावारिस लाशों के ढेर हैं।

हमेशा की तरह दोष या तो कळजुग पर ढोळा जा रहा है, या पश्चिमी सभ्यता पर। मेरे ख्याल में जरूरत खुद में दोष देखने की और उसे मानने की है। सुधार आगे की बात है।


किसी मोड़ पर लावारिस बुजुर्ग जो मिले, तो पूरा जापान अब भी उबासुते की कहानी को कोसता है। कहता है कि कितना ही अच्छा होता, अगर हमारी भाषा में यह शब्द ही ना होता।

हम भी जितना जल्दी इस कहानी के रूप चीन्हें और उन्हें कोसना शुरू करें, उतना बेहतर। 


✍️ लक्ष्य 


(चित्र तलैकूथल परम्परा में दो बार जहर देने के बाद भी बच गई एक वृद्धा का है।)

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