रविवार, 4 अक्तूबर 2020

नींद में बातें करना बुरी आदत हो सकती है, लेकिन इसी ने मुझे और बुरी आदतों में पड़ने से बचाया

मेरे बचपन का यह किस्सा सत्याग्रह डॉट कॉम पर पब्लिश हुआ है। यहाँ पर जुड़े बहुत से लोग शायद वहाँ इसे ना पढ़ पाएँ हो, इसलिए यहाँ पोस्ट किए दे रहा हूँ। 

सत्याग्रह की लिंक यह है - जब मैं छोटा बच्चा था : लक्ष्मण बिशनोई

बात तब की है, जब मैं छठी-सातवीं कक्षा में पढ़ा करता था. हम लोग शुरू से ही औद्योगिक क्षेत्र में रहे हैं. रीको नाम से राजस्थान सरकार हर जिला मुख्यालय पर एक औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया करती है, जहां कुछ छोटी-मोटी उत्पादन इकाइयां लगी होती है. अमूमन रीको शहर से लगभग दो-तीन किलोमीटर बाहर होता है. नागौर जिले के मुख्यालय के इसी रीको में हमारा घर था. दो मंज़िला मकान में नीचे प्रिंटिंग प्रेस हुआ करती थी और ऊपर के कमरे में हमारा घर.

पापा प्रिंटिंग प्रेस चलाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता भी किया करते थे. उन दिनों उन्होंने जिला स्तर के एक दैनिक अखबार का प्रकाशन शुरू किया था. यह एक सांयकालीन अखबार था. सीमित ग्राहकों तक विस्तार था और खुल्ले में भी बिका करता था. एक रुपये में एक अखबार.

तो उन दिनों मैं सब के मना करने के बावजूद अखबार बेचने शहर जाने लगा. मेरे इसमें दो निजी स्वार्थ थे. एक तो पापा के ऑफिस (शहर) जाने का बहाना मिल जाता, वो भी स्कूटर से. वहीं मैं बीस पच्चीस अखबार बेच देता तो मुझे दो-तीन रुपये खर्च करने को मिल जाया करते थे, यानी कि कमीशन. हफ्ते-दस दिन में जब बीस तीस रुपये जमा हो जाते तो मैं कभी कुछ चटपटा खा लेता या फिर कोई कॉमिक्स खरीद लेता.

इसी सिलसिले के चलते एक दिन इन पैसों को लेकर मेरी नीयत खराब हो गई. दीवाली के दूसरे दिन बड़े दैनिक अख़बारों की छुट्टी हुआ करती है. हमारी प्रिंटिंग प्रेस घर में ही थी और अखबार भी छोटे स्तर का था तो हमारा अखबार उस दिन भी छपता था. बाकी अखबार बंद रहने के कारण उस दिन हमारा अखबार ज्यादा बिक जाया करता था. दीवाली के अगले दिन मैं भी अखबार बेचने निकला. किस्मत से उस दिन अखबार बीस की जगह तीस बिक गये बल्कि तीस से भी ज्यादा शायद छत्तीस के आस-पास. तो अब हुआ यूं कि ये पैसे देखकर मेरा मन खराब हो गया. मैंने छत्तीस में से छह रुपये पैंट की जेब में डाले और तीस रुपये मुट्ठी में दबाकर निकल पड़ा, खर्च करने. एक बार लगा कि गलत कर रहा हूं. शायद मन से आवाज़ आई कि यह गलत है. मैंने धृष्टता की और मन की आवाज को कोने में दबाया और आगे बढ़ गया.

मैं एक बड़ी नमकीन की दुकान पर पहुंचा. यहां मैंने दस रुपये में दही चटनी वाली प्याज की कचौरी खाई, दस रुपये का एक मिर्ची बड़ा खाया. दीवाली का दूसरा दिन था, सर्दी भी आ ही रही थी तो स्टेशन पर गजक और तिल की पपड़ी के ठेले भी लगने शुरू हो गए थे. इस तरह मेरे दस रुपये यहां भी होम हो गए. गजक खाई या तिल पपड़ी, ये ढंग से याद नहीं. ये सब चीज़ें घर पर भी बन जाया करती थीं फिर भी स्टेशन पर खड़े होकर या ऊंची सी दुकान में लगे चमकते से फर्नीचर पर बैठकर खाने का सा मज़ा घर में थोड़े ही आता है. इस तरह मेरे हाथों वो तीस रुपये खर्च हुए. खट्टी-मीठी सी डकार ली, मुंह पोंछा और चल दिए मस्ती से ऑफिस की ओर.

पापा कुछ लिख पढ़ रहे थे. मैंने उन्हें छह रुपये हाथ में दिए और दुखी सी शक्ल बनाते हुए कहा – ‘आज स्टेशन पर बहुत कम लोग थे, पता नहीं चक्कर क्या है.’ बड़ा भाई ऑफिस में बैठा करता था, वो बोला – ‘कल दीवाली थी न, घर पर होंगे लोग. त्यौहार को सब बाहर कहां निकलते हैं. आज तो बहुत सी दुकानें भी बंद रही.’ मैंने भी बुझी-बुझी आवाज़ में कहा – ‘हां, यही लगता है.’ और भाई के पास जाकर कुर्सी पर बैठ गया. कंप्यूटर की स्क्रीन की तरफ झांकने लगा. पापा हमेशा की तरह कुछ नहीं बोले.

घण्टे भर बाद पापा, भाई और मैं – हम तीनों घर आ गए. खाना-वाना खाया. थोड़ी देर में सब लोग सो गए. मैं भी अपनी आज की चालाकी पर मन ही मन खुश होता हुआ अपने बिस्तर में घुस गया.

अब बड़ी गड़बड़ हुई साहब. नींद आसपास भी नहीं फटक रही थी. इंसान दिनभर में मन की बिना सुने जो कुछ करता है, रात को सोते वक्त उसका मन समझाया करता है कि भई, आज ये बड़ी गलती कर दी, सुधर जा! मेरा बालमन भी ऐसा ही कुछ समझा रहा था. मैंने ऐसी गलती पहली बार की थी इसलिए तीस रुपये हज़म नहीं हो पा रहे थे. मैं खुद को दिलासा दे रहा था कि जो भी हो, कचौरी बड़ी मस्त बनी थी, लेकिन मन नहीं माना तो नहीं माना. मन कहता रहा – मैंने गलत किया है और मैं समझाता रहा कि सब सही है. आधे-पौन घण्टे उधेड़बुन चली लेकिन मैंने ढीठ बनते हुए फिर मन को दबाया और सो गया. बड़ी मुश्किल हुई, लेकिन नींद आ गई.

सुबह हुई. मैं देर से उठा करता था. जब उठा तो नीचे के कमरे में आया. पापा-मम्मी, भाई-बहन चारों लोग अखबार पढ़ रहे थे. हरदम भी मैं ऐसे ही आता और भाई या बहन दोनों में से किसी एक से अखबार का एकाध पन्ना छीनकर पढ़ने लगता. आज जैसे ही पास पहुंचा तो पापा चश्मे के ऊपर से मुस्कुराते हुए झांकने लगे. मम्मी भी धीरे-धीरे हंस रही थी. भाई और बहन दोनों ठहाके लगा रहे थे. मुझे कुछ समझ में नहीं आया. मुझे लगा कोई बात चल रही होगी. मैंने बहन के हाथ से अखबार छीनने की कोशिश की तो वो बोली – ‘रुक जा, सुन तो ले पापा क्या कह रहे हैं?’

मैं पापा की तरफ मुड़ा. पापा मुस्कुराए, बोले- ‘कचौरी कौन सी दुकान से खाई थी? पूनम जी वाली दुकान से या बालू जी वाली दुकान से?’

मुझे काटो तो खून नहीं. इन्हें कैसे पता चल गया, किसने बता दिया? किसी ने देख लिया लगता है.

फिर भी, बात संभालनी तो थी ही, बिल्कुल अनजान बनते हुए मैंने कहा कौन-सी कचौरी?

पापा बोले बेटा, तीस रुपये इतनी आसानी से थोड़ी हजम हो जाएंगे. रात को दो बजे तू ही बता रहा था कि अखबार बेचे तो छत्तीस थे, तीस मैं खा गया.

अब जाकर मुझे पूरा माज़रा समझ आया. दरअसल मुझे नींद में बोलने की आदत थी. उस रात सोते वक्त मन में यही सब चल रहा था तो रात को नींद में ही पापा को जगाया और उन्हें सारी बात बता दी थी. और इसके बाद फिर से सो गया. यानी अवचेतन मन वो सब कर गया जो मैं उसे नहीं करने देना चाहता था.

अब पापा बोले जा रहे थे कि बेटा, मन की बात सुन लिया करो. मन जिस काम के लिए मना करे, वो काम मत किया करो... और ऐसी बातें सुनाते हुए वे मुझे समझाइश दे रहे थे. मैं शर्म से पानी-पानी हो रहा था कि सब गड़बड़ हो गई. उस घटना के बाद नींद में उठकर बात करने के डर से फिर मैंने कभी ऐसी गलती नहीं की. लोग कहते हैं कि नींद में बातें करना बुरी आदत है लेकिन अपने लिए मैं इसे अच्छा ही कहूंगा क्योंकि इसी ने मुझे और बुरी आदतों में पड़ने से बचाया है.

लक्ष्मण विश्नोई सत्याग्रह के नियमित पाठक हैं और नागौर (राजस्थान) में रहते हैं.

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