संदेश

स्वतन्त्रता दिवस

चित्र
  दूसरी या तीसरी कक्षा के दो बच्चे और दो ही शिक्षक। बच्चे उघाड़े बदन। छाती तक पानी में डूबे हुए। शिक्षकों के भी घुटनों तक पानी है, हेडमास्टर जी ने पानी में भीगा कुर्ता समेट रखा है। लेकिन सब का माथा ऊपर उठा हुआ है, आंखे तिरंगे की ओर देख रही हैं और हाथ सलामी की मुद्रा में है। मुझे ये चित्र देखकर रोमांच हो आया। लाल किले पर या सरकारी स्टेडियमों में लहराता तिरंगा मुझे रोमांच नहीं देता। खुशी जरूर देता है। और तो और, मुझे तो यहाँ तक लगता है कि तिरंगा हर किसी के हाथ में जमता ही नहीं। कोई भ्रष्ट नेता या अधिकारी जब तिरंगा फहरा रहा होता है, तो मैं सोचता हूँ कि अगर तिरंगे में प्राण होते तो ये अवश्य ही लहराने से मना कर देता। वहीं, किसी जवान के हाथ में, किसी बच्चे के हाथ में, किसी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में या किसी झुग्गी झोंपड़ी में लहराता तिरंगा देख मैं पुलकित हो उठता हूँ। मुझे लगता है कि अब तिरंगा भी खुश है। इतनी पहचान तो तिरंगा भी मन ही मन अवश्य करता होगा। बकौल जगदीश सोलंकी- "जुबां से कुछ न बोले, पर तिरंगा जानता सब है।" आज अफसोस ये कि तिरंगे की हुमक बनाए रखने वालों से किसी को मतलब नहीं। बच...

हृदयहीनता की पराकाष्ठा

चित्र
आशा साहनी। वही अभागी मां, मुम्बई के लोखंडवाला से कल जिसका कंकाल बरामद हुआ है। अमेरिका में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटे की उससे अंतिम बार फोन पर बात अप्रैल 2016 में हुई थी। अकेले रह कर टूट चुकी बूढ़ी मां फोन पर रोई और बेटे से कहा कि अब अकेले रहा नहीं जाता। कहीं कोई वृद्धाश्रम तलाश करुँगी और वहीं रहूँगी। नाराज थी, गुस्से में थी तो कह दिया होगा कि आईंदा मुझे फोन मत करना और 'आज्ञाकारी' बेटे ने सचमुच सवा साल तक खबर ही न ली! बेटे को सवा साल से मालूम ही नहीं कि उसे जन्म देने वाली माँ किस हाल में है, जिंदा भी है कि मर गई। हृदय हीनता की पराकाष्ठा! इसी बेटे के जन्म पर उस माँ ने उत्सव मनाया होगा। बेटे ने कर्त्तव्य निर्वहन के नाम पर पैसे जरूर भेजे थे, कंकाल के सिरहाने 50 हजार रुपये पड़े मिले हैं। लेकिन माँ दौलत कब चाहती है। उसकी दौलत तो बेटा हुआ करता है। ये माँ तो इतनी अभागी रही कि उसका बेटा दौलत को ही माँ मान बैठा। और, सोसायटी के लोग ? पड़ोसी ? निष्ठुर! निर्मम! तटस्थ ! बेटे को एक बार ई मेल किया था क्योंकि सोसायटी के रख रखाव के खर्चे के पैसे बुढ़िया ने 6-7 महीनों से भरे नहीं थे। क...

रक्षाबंधन विशेष - मायरो

बीरा बणजे तू जायल रो जाट, बणजे खिंयाला रो चौधरी। कथा लगभग छह सात सौ साल पहले की यानि कि सल्तनत काल की है और यूं है कि नागौर में दो चौधरी हुआ करते थे। नाम था गोपाल जी और धर्मो जी। गोपाल जी जायल गांव के बासट गोत के जाट और धर्मो जी खिंयाला के बिडियासर । दोनों चौधरी उस समय के पटवारी के पद पर थे। दिल्ली के सुल्तानों के लिए लगान संग्रहण करने का कार्य किया करते थे और ये काम वो दोनों कई सालों से किया करते थे। क्योंकि सुल्तान बदल जाया करते हैं, पटवारी नहीं बदला करते। दोनों चौधरी साल में एक बार किसानों से निर्धारित रकम वसूला करते, जो भी सुल्तान गद्दी पर होता, उस तक पहुंचा दिया करते और अपनी तनख्वाह ले लिया करते। इस बार हुआ यूं कि सुल्तान ने लगान बढ़ा दिया। कारण क्या रहा, मुझे नहीं मालूम। कोई नई लड़ाई छेड़ बैठा होगा, कोई नई खुराफात सूझी होगी या कोई नई शादी की मन में आ गई होगी। दिल्ली की जायज नाजायज मांगे दूर कहीं खेतों में खप रहा किसान हमेशा से ही आंखे मींच पूरी करता रहा है। खैर, कारण जो भी रहा हो, कहानी को इस बात से मतलब है कि चौधरियों को दुगुने पैसे ले कर जल्दी से जल्दी वहां पहुंचने के लिए प...

मानव धर्म

नहीं आवश्यक परिक्रमा देवालयों के स्वर्णिम विग्रह की। नहीं आवश्यक भक्ति साधना किसी कुपित क्रोधी ग्रह की। नहीं आवश्यक है कि तुम तीर्थ यात्रा करते घूमो। नहीं आवश्यक है कि तुम मस्जिदों की चौखट चूमो। किसी धर्म ग्रन्थ का पाठ भी नहीं आवश्यक है कभी। गंगा यमुना का घाट भी नहीं आवश्यक है कभी। मानव हित में महान पुण्य, परोपकार का कर्म है। भूखे को रोटी देना ही सच्चा मानव धर्म है। ----> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"

सपनों को मरने मत देना

तेज आँधियों को दिये के, प्राण कभी हरने मत देना। सपनों को मरने मत देना।। गगरी फूटी, नई बनाओ। माला टूटी,फिर से सजाओ। नन्हें कदम जब बढ़ना चाहें, पकड़ अंगुली, हिम्मत बढ़ाओ। चलना सीख रहे बच्चे को गिरने से डरने मत देना। सपनों को मरने मत देना।। धूप नहीं,उजियारा देखो। दुनिया से कुछ न्यारा देखो। तूफानों से कांपे जगत जब, पार कहीं किनारा देखो। भँवरों से भी भिड़ जाने दो, कश्ती खड़ी करने मत देना। सपनों को मरने मत देना।। ----> लक्ष्मण बिश्नोई 'लक्ष्य'

मेरे जीवन की हिस्सेदार हर नारी को समर्पित

जगती में जब मेरा जीवन, आहत अकुलाए आघातों में। क्लांत कलेजा कूक पड़े जब, दु:ख की चुभती बरसातों में। जब मन के प्रकाशित कोनों में, स्याह अंधेरा जम जाए। जब प्रगति पथ पर जीवन रथ, खा हिचकोले, थम जाये। उमंग भरी इन आँखों में मेरी, यह दृश्य जो फिरा कभी- शिखरों पर बैठा मैं, गर्त में अभी गिरा,हाय!गिरा अभी तब तुम आना, प्रेरक बनकर, उम्मीदों की सौगात लिए। तब तुम आना, प्रथम किरण सी, मनमोहक प्रभात लिए। तुम दीपक बनकर, मुझको, जग में तम से लड़ना सिखला देना। कर सारथ्य जीवन रथ का, राह नई तुम दिखला देना। मेरे तुम पर विश्वासों को, साबित करना तुम सत्य सदा। सफल पुरुष की शक्ति नारी, सत्य रहे यह तथ्य सदा।। ---> लक्ष्मण बिश्नोई लक्ष्य

आओ वृक्ष लगाएं हम

प्रत्येक प्रसून-पत्र जिसके मानुष हित में न्यौछावर हैं, जिसकी शाख प्रशाख तले छाया पाते यायावर हैं, जिसके सुरभित कुसुम सदा ही मान बने, सम्मान बने। जिसके होने से ही खेत बने खलिहान बने, उद्यान बने। जिसने मनुज को प्राणवात सा जीने का आधार दिया, जिसके झुरमुटों ने मां वसुधा के आंचल का श्रृंगार किया, जिसकी छवि छटा ही मनमोहक और मतवाली है। जिसकी शस्य श्यामल कांति मन को छूने वाली है। जिसने नभचरों को निवास दिया,रहवास दिया। फल-फूल दिए,उल्लास दिया,हुल्लास दिया। अपने उत्पादों से पालन पोषण का विश्वास दिया। उपकारों से समृद्ध सभ्यताओं का इतिहास दिया। पुराण जिसके पत्र पत्र में विबुधों सा विश्वास जताते हैं, मूल छाल और डाल डाल में त्रिमूर्ति का वास बताते हैं। जिसके संवर्द्धन से दस पुत्रों के पालन सा पुण्य मिले, जिसकी छांव तले जगत को दशमलव और शून्य मिले। जिसकी छांव तले ही सनातन-बौद्ध-जैन-से पंथ बढ़े। जिसकी छांव तले ऋषियों ने उपनिषदों-से ग्रंथ गढ़े। बाईबिल जिसको परमेश्वर की अनुपम देन कहती है। जिसे काटने की मनाही पैगम्बर के फरमानों में रहती है। ऐसे हरे वृक्ष के सरंक्षण का उत्तरदायित्व...