रविवार, 20 अक्तूबर 2013

यादें

पिछली पोस्ट पर बहुत बड़े बड़े ब्लागरों के कमेण्ट प्राप्त हुए तो दिल में कुछ और नया लिखने की इच्छा जगी। तो कल रात को एक छोटी सी कविता और लिखी अब ये तो पता नहीं कि इसे क्या कहते है। कहीं से सुना था कि ये कुण्डली है खैर जो भी हो जो दिल में आया लिख दिया देखकर बताइएगा कैसी लगी


पोस्टकार्ड का गया जमाना, बीती बातें तार की।

फैक्स हुआ ओल्ड फैशन, टेलीफोन चीज बेकार की।।
टेलीफोन चीज बेकार की, मोबाईल क्या आया।
कैमरा, टार्च और अलार्म, सब का हुआ सफाया।।
सब का हुआ सफाया, घड़ी पता नहीं कहां खोई।
कैसेट बिचारी बैठ के, बंद कमरे में रोई।।

बंद कमरे मे रोई, टेप रिकार्डर अब कौन बजाए।
रेडियो के आगे बैठ कर, अब महफिल कौन सजाए।।
अब महफिल कौन सजाए, चीजें आई जब नई नई।
कौन जाने और क्यों जाने, टेलीफोन डायरी कहां गई।।
‘लक्ष्य’ जमाना बदल रहा, अब बस यादें रह जाएगी।
कभी चुपके से कानों में, जो अपनी कहानी कह जाएगी।।
-लक्ष्मण बिश्नोई

और अब अपडेट

समीर लाल जी समीर ने इस कविता को सम्पादित करके कुछ यूँ शुद्ध कुंडली का रूप दिया

पोस्टकार्ड का गया जमाना, बीती बातें तार की।
फैक्स पुरानी बात हो गया, फोन चीज बेकार की।।
फोन चीज बेकार की, मोबाईल जब हाथ में आया।
कैमरा, टार्च और अलार्म, सबका हो गया सफाया।।
कहत ’लक्ष्य’ कविराय कि कलाई से घड़ी है खोई।
गानों की कैसेट भी बेचारी, बैठ बंद कमरे में रोई।।

नया दौर है आज राज, टेपरिकार्डर अब कौन बजाए।
रेडियो के आगे बैठ कर, अब महफिल कौन सजाए।।
अब महफिल कौन सजाए, है तकनिक की धार नई।
टेलीफोन वाली डायरी भी अब, नजर से पार गई।।
‘लक्ष्य’ जमाना बदल रहा, अब बस यादें रह जाएंगी।
कभी हवा संग आ कानों में, अपनी कथा सुनायेंगी!!
-लक्ष्मण बिश्नोई

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

बापू

एक बापू गांधी थे, दूजे बापू आप।
वो सत्य अहिंसा के साधक, आप पाप के बाप।।
आप पाप के बाप, शर्म लज्जा सब खो गई।
हे राम की वाणी अब, हाय राम हो गई।।
हाय राम हो गई, ढोंगी हुए सब महात्मा।
अधर्म पैर पसारता, धर्म का हुआ खात्मा।।

धर्म का हुआ खात्मा, वासना चारों ओर।
मुख में हरि ओम जपते, मन में बैठा चोर।।
मन में बैठा चोर, रावण को देते टक्कर।
जर जोरू और जमीन के रोज चलते चक्कर।।
कहता लक्ष्मण बात यह, यही सबसे बड़ा रोग।
ऐसे ढोंगी बाबाओं को, फिर भी पूजते लोग।।

शनिवार, 28 सितंबर 2013

बचपन

वो दिन कितने अच्छे थे,
जब दिल हमारे सच्चे थे।
वो बचपन कितना सुहाना था,
जब हम छोटे बच्चे थे।

जब मिट्टी के घर बनाते थे,
हम दिनभर पतंग उड़ाते थे।
जब मम्मी से आंख बचाकर,
हम बाहर खेलने जाते थे।

जब हम ही चोर हम सिपाही,
हम ही राजा बनते थे।
जब गिल्ली डण्डा खेलने,
हम दो टीमों में बंटते थे।

जब लाल पीले हरे पंख,
हम कापी में दबाकर रखते थे।
जब सांप सीढी और चिड़िया उड़,
हम खेलते नहीं थकते थे।

जब अण्टी के घर की घण्टी,
हम बजा कर भाग जाते थे।
जब 26 जनवरी के लड्डू,
हम बड़े चाव से खाते थे।

जब पेड़ पर चढ कर के,
हम उतरने को चिल्लाते थे।
जब घरवालों से छुपकर,
हम गुलेल खूब चलाते थे।

जब कागज की नाव बनाकर,
हम पानी में तैराते थे।
जब बारिशों में अक्सर,
हम झूम झूम नहाते थे।

जब सुबह सुबह प्रार्थना को,
हम लाईन में लग जाते थे।
जब मैम के क्लास में आते ही,
हम गुड मार्निंग गाते थे।

जब होमवर्क अधूरा होता था,
हम झूठे बहाने बनाते थे।
जब मैडम छुट्टी रखती थी,
हम सब खुशी मनाते थे।

जब दोस्तों के संग मिल,
हम अमचूर इमली खाते थे।
जब एक रूपए की चार टाफी,
हम दूधमलाई वाली लाते थे।

जब नेशनल चिल्ड्रंस बैंक के,
हम नकली नोट गिनते थे।
जब दोस्तों के हाथ से,
हम कंचे, चुम्बक छीनते थे।

जब नई कापी लाते ही,
हम सुगंध उसकी लेते थे।
जब दोस्तों को बर्थ डे पर,
हम शायरी लिख कर देते थे।

जब दादी नानी से जिद कर,
हम कहानियां सुनते थे।
जब परियों, राजकुमारों के,
हम सपने अक्सर बुनते थे।

जब मेहमानों के आने पर,
हम कमरे में छुप जाते थे।
जब वापिस उनके जाते ही,
हम बची हुई मिठाई खाते थे।

बस वही तो दिन थे,
जब हम दिल की सुनते थे।
बस वही तो दिन थे,
जब हम सच्चाई को चुनते थे।

लेकिन ये जो समय है,
ये तो चलता जाएगा।
बचपन जवानी बुढापे में,
जीवन को बदलता जाएगा।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

जय जय जय घरवाली

अभी कुछ दिनों पहले कुवारों के लिए एक गीत लिखा है। तो कुछ पत्नी पीड़ितों ने भी एक गीत लिखने की गुजारिश की। लीजिए हाजिर है हुजूर । और हाँ इसे ओम जय जगदीश हरे की धुन में गा कर देखिएगा हो सकता है जीवित आत्मा को शांति मिले।

जय जय जय घरवाली
हो देवी जय जय घरवाली
तुम्हरे सामने अभी तक
किसी की नहीं चाली।।

तुम सैण्डिल की देवी
तुम बेलन वाली
हो देवी आप बेलन वाली
तुम्हरा वार अभी तक
गया न कभी खाली।।
जय जय.........

कभी फेंकती झाडू हम पर
कभी फेंके थाली
हो देवी आप फेंकती थाली
कईयों ने इस भक्ति में
परमगति पाली।।
जय जय..............

जिस दिन तुम्हरे मन में आता
जी भर देती गाली
हो देवी जी भर देती गाली
तुम्हरी महिमा हर दम
गायें बजा ताली।।
जय जय..............

प्रेम से बोलिए घरवाली देवी की जय।।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

पापा मेरी भी शादी करवा दो ना

एक छोटा सा गीत । अखण्ड और चिर कुंवारो के लिए उपयोगी।  मेरे लिए तो नहीं फिर भी किसी और के लिए लिखा है. देख के बताइयेगा कैसा लगा।

पापा मेरी भी शादी करवा दो ना
मेरे लिए कहीं से एक बीवी ला दो ना

मुझे बीवी चाहिए चाहे लम्बी हो या छोटी
चाहे गोरी हो या काली चाहे पतली हो या मोटी
मेरे लिए प्लीज पापाजी एक लुगाई ला दो ना
पापा मेरी भी शादी करवा दो ना

मैं नौकरी करूंगा वो घर का काम करेगी
आप देखना टीवी मम्मी आराम करेगी
सात फेरे एक बार मुझे भी दिला दो ना
पापा मेरी भी शादी करवा दो ना

शादी वाला वो लडृडू पापा हर किसी को भाए
जो खाए वो पछताए, ना खाए ज्यादा पछताए
शादी वाला वो लडृडू मुझे भी खिला दो ना
पापा मेरी भी शादी करवा दो ना

रविवार, 15 सितंबर 2013

जंगल की डेमोक्रेसी

जंगल का राजा शेर, 
हुआ वन से लापता।
कई दिनों तक खोजखबर ली, 
मिला न कोई अता पता।
मिला न कोई अता पता,
सूनी हुई सरकार।
जनता सारी लड़ने लगी,
कर आपस में तकरार।
कर आपस में तकरार,
घोषित बैठक आपात हुई।
चुनाव करा दो इस बार,
तय अंत में यह बात हुई।

वोट हुए जंगल में भी,
अब डेमोक्रेसी आ गई।
बंदर बना राजा जंगल का,


जनता खुशी मना रही।
जनता खुशी मना रही,
शांतिपूर्ण सब काम हुआ।
पर शेर के वापस आने से,
चैन सबका हराम हुआ।
चैन सबका हराम हुआ,
गायब मिला बकरी का बच्चा।
गुहार लगाई राजा जी से,
न्याय करो अब सच्चा सच्चा।

महाराजधिराज बंदर राजा ,
चले जनता के आगे आगे।
जहां बैठा था आतंकवादी,
पहुंचे वहां भागे भागे।
पहुंचे वहां भागे भागे,
खेल रहा शेर बच्चे से।
जनता बोली राजा जी से,
अब सबक सिखाओ अच्छे से।
सबक सिखाओ अच्छे से,
राजा कूदे डाल डाल पर।
कड़ी निंदा करते हुए,
परेशान जनता के हाल पर।

बकरी बोली महाराज,
जल्दी से कुछ एक्शन लो।
बच्चा मेरा मारा जाएगा,
आप जरा तो टेंशन लो।
आप जरा तो टेंशन लो,
राजा बोले डरे डरे।
जो खाएगा वो तो खाएगा,
हम तो इसमें क्या करे।
हम तो इसमें क्या करे,
मत हमें अब सताओ तुम।
हमारी मेहनत में कहीं कोई,
कमी हो तो बताओ तुम।


नोट चित्र अंतरजाल से लिया गया है जिसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन है किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं।

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

सौ और एक सौ आठ

फिर एक बकवास पोस्ट। आप लोग पढने के बाद  ऐसा सोच सकते है. पर आज मैं बहुत खुश हूँ. अब पूछिए क्यो ? क्या कहा ? नहीं पूछोगे। मत पूछो। मैं तो बिना पूछे ही बता दूंगा। अब देखिये  जनाब हुआ यूं कि आज मेरे इस छोटे से ब्लॉग पर अनुसरण कर्ताओ की संख्या पूरी एक सौ हो गयी है. एक छोटा सा ब्लॉग अगर इस तथाकथित मुकाम तक पहुँचता है तो खुश होने का कारण तो बनता ही है हूजूर। 
जब मैंने दसवी कक्षा का एग्जाम दिया तो गर्मी की छुट्टियों में निट्ठल्ला बैठा रहता था . तो नेट पर कुछ महानुभावो के ब्लॉग पढने को मिले तब मेरे दिल में ये ख्याल आया कि क्यों न मैं भी एक ब्लॉग लिखूं। बस इस तरह शुरुआत हुई थी इस बहुत कुछ की. पहले साल तो जोश जोश में जो भी मन में आया या जो भी देखने में अच्छा लगा उसे पोस्ट करता गया और पहले साल यानि 2011 में तो 94 पोस्ट कर डाली। फिर अगले साल ऐसा लगा के छोडो ना यार कौन पढता है मेरे ब्लॉग को. धीरे धीरे लिखना कम कर दिया और दुसरे साल यानी 2012 में सिर्फ 6  पोस्ट की।  लेकिन तभी अचानक एक दिन देखा कि ब्लॉग पर पेज व्यू बढ़ रहे है और अनुसरणकर्ता भी बढ़ कर 50 से ऊपर हो गए है।  तो फिर एक बार जोश आया और फिर पोस्ट करने शुरु किये.लेकिन रेगुलर पोस्ट नहीं कर पाया। फिर भी आज तक कुल पोस्ट 108 हो चुकी है, और पेज व्यू भी लगभग 26000  है सो खुश होने का कारण तो बनता है. सो मी हैप्पी हैप्पी टू डे..अभी मैं फर्स्ट इयर में आ गया हूँ, तो टाइम मिलने पर पोस्ट जरुर करता रहूँगा। 
अब रही बात मेटर की तो पहले साल तो बहुत कुछ पोस्ट किया। कभी तकनीक के बारे में तो कभी साहित्य के बारे मे. और अगली साल कुछ खुद ने छोटी छोटी सी बचकानी कवितायेँ लिखनी शुरू कर दी थी सो वो पोस्ट करनी शुरू कर दी थी और आज तक कर रहा हूँ. फिर भी लोग मुझे पढ़ रहे है बस यही बहुत है. अंत मैं सभी अनुसरण कर्ताओ को बहुत बहुत धन्यवाद. सभी टिप्पणीकारो को भी धन्यवाद और ब्लॉग पर पधारने वाले सभी आगंतुको का भी हार्दिक आभार.एक बार फिर खुद को ही 108 पोस्ट और 100 अनुसरण कर्ताओं तक पहुँच बनाने के लिए शाबाशी  जय भारत।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

नागीणो नागौर

मेरे छोटे से शहर नागौर के बारे में कुछ बाते मेरे शहर की ही भाषा राजस्थानी में 

शहर अणूतां इण दुनियाँ मांही
पण जठै री बात ही कीं और है।
बो नागीणो नागौर है।।

सबसूं न्यारे इण शहर पर
कोई नी करियो गौर है।
बो नागीणो नागौर है।।

जठै केर सांगरी कुमठा
अर मीठा मीठा बोर है।।
बो नागीणो नागौर है।।

जठै चीं चीं करती चिड़कल्याँ
अर पीहू पीहू करता मोर है।।
बो नागीणो नागौर है।।

जठै भोली भाली जनता सारी
अर नेता हरामखोर है।।
बो नागीणो नागौर है।।

जठै पुलिस राखे मौन व्रत
अर चोर मचावै शोर है।
बो नागीणो नागौर है।।

जठै रा बळदां री चर्चा
जग में च्यारूं ओर है।
बो नागीणो नागौर है।।

जठै रा मानखां तो कांई
फेमस ढांगर ढोर है।
बो नागीणो नागौर है।।



जठै किसान मजूर मेहनती सारा
कोई नी कामचोर है।
बो नागीणो नागौर है।।

जठै अमरसिंह जेड़ा राजवी
मानीज्या जग में जोर है।
बो नागीणो नागौर है।।

कठै ही चोखो कठै ही माड़ो
ऐड़ो म्हारो ओ नागौर है।
ओ नागीणो नागौर है।।

सब रै हिरदै में बस्योड़ो
म्हारे कालजियै री कोर है।
ओ नागीणो नागौर है।।
बो नागीणो नागौर है।।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

दोस्त बड़े कमीने

बात है कालेज की,
काम की और नालेज की।
ग्रुप स्टडी के नाम से,
दोस्त के घर बैठा मैं आराम से।।

हंसी मजाक और जोक चले,
इधर उधर की कुछ बात हुई।
इसी चक्कर में दोस्तों,
अंधेरी आधी रात हुई।।

घर पहुंचते ही डैडी मिले,
डंडा लिए रेडी मिले।
डर के मारे मैं कांप रहा था,
सिचुएशन को भांप रहा था।।

डैडी बोले सुन, मेरे बिगड़े लाल,
चल बता अब तू आंखो देखा हाल।
कहां गया था बोल अब,
पोल अपनी खुद खोल अब।।

बिगड़ी बात पर ढक्कन लगा के,
चिकना चुपड़ा मक्खन लगा के।
मैं बोला सुनो डैडी जी मेरी बात,
ग्रुप स्टडी के चक्कर में हुई आधी रात।

यह सुनते ही डैडी ने,
झट से लिया फोन मेरा।
मैं भी अब समझ गया कि
बजा पूंगी का टोन मेरा।।

दस कमीनों को जो फोन किया,
तो नौ बोले अरे वो यहीं है।
थोड़ी देर में आ जाएगा,
टेंशन की बात नहीं है।।

एक ने हाँ पापा बोल के,
गड़बड़ बड़ी मोटी कर दी।
खुद पिताजी ने आकर मेरी,
पतलून दो बिलांग छोटी कर दी।।

सच कहूं मैं दोस्तों,
दोस्त बड़े कमीने।
खूब धुलाई हुई मेरी,
फिर छुड़ाया मम्मी ने।।

रविवार, 7 जुलाई 2013

मेरे सपनों का भारत

आओ सुनो तुम्हे बताऊँ 

कैसा मेरा हिन्दुस्तान हो


जो है मेरे सपनों का भारत


वो कैसे फिर से महान हो।

धर्म सारे फले फूले


इंसान में भगवान हो


मस्जिद में राम की पूजा


और मंदिर में रहमान हो।


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो।

बच्चे बूढे सब पढें


सब को आखर ज्ञान हो


हर व्यक्ति के पास रोटी,


कपड़ा और मकान हो।


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो।

भ्रष्टाचार का नाम ना हो


और ना आंतकवादी शैतान हो


सारे नेता शरीफ बने


और मेहनती किसान हो।


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो ।

हिन्दी चीनी भाई भाई


दोस्त जैसा पाकिस्तान हो


ना किसी से दुश्मनी रहे


भारत फिर से महान हो।


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो।

सिक्ख ईसाई साथ रहे


साथ हिन्दु मुसलमान हो


मस्जिद में आरती और


मंदिर में अजान हो।


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो।

झण्डा ऊँचा रहे हमारा


अलग तिरंगे की शान हो


भारत विश्व गुरू बने


कदमों में सारा जहान हो।


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो।

चारों और खुशियां ही खुशियां


खुश मजदूर और किसान हो


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो।


ऐसा मेरा हिन्दुस्तान हो।


बुधवार, 26 जून 2013

भगवान कैसा होता है?

केदारनाथ को जाती हुई
एक बस में
कुछ भक्तजन
चर्चा कर रहे थे
कि भगवान कैसा होता है?
कोई कह रहा था
कि ऐसा होता है
दूसरा बोला नहीं नहीं
वैसा होता है
बहस चलती रही
कोई भी नहीं माना
कि भगवान कैसा होता है?
तभी अचानक आसमान से
विपदाओं का पहाड़ गिरा
सभी चीखने चिल्लाने लगे
उसी भगवान को पुकारने लगे
जिसके बारे में बात कर रहे थे
कि भगवान कैसा होता है?
तब एक फौजी वहां आया
उन्हें गोद में उठाकर
वहां से बचा कर
बाहर ले आया
एक छोटी सी बच्ची बोली
मां मां मैं बताऊँ
भगवान कैसा होता है
देखने लगे सभी उसे
वो फौजी की तरफ
अंगुली करके बोली
भगवान ऐसा होता है

शनिवार, 25 मई 2013

तौलिया और रूमाल

अब जब हर तरफ मैच फिक्सिंग की ही चर्चा है, तो मैं कैसे पीछे रहता, सो लिख डाली एक छोटी सी कविता-

तौलिया और रूमाल

डाल कमर पर तौलिया,बॉलर ने फेंकी बॉल।
पहले से ही तय था, हर बॉल का मोल।।
हर बॉल का मोल,रन सोलह देने है।
मैच पूरा होते ही,साठ लाख लेने है।।

ओवर की तीन गेंदे,चली गई जब खाली।
बॉलर हुआ एन्ग्री,चेहरे पर छाई लाली।।
चेहरे पर छाई लाली,बॉलर बोला बोल।
रन बना मेरे भाई,सोलह का हुआ कौल।।

बैट्समेन ने जवाब दिया,सुन बॉलर का सवाल।
दिखता नहीं क्या तेरे को,मेरे गले का रूमाल।।
मेरे गले का रूमाल,सोलह बनाऊँ कैसे,
जब मैंने भाई से,लिए चार के पैसे।।

शनिवार, 18 मई 2013

ओ री चिड़िया

ओ री चिड़िया सुन ले
मेरे मन की बात
चुग्गा तुझे खिलाऊँगी
ले चल अपने साथ

धरती पर बैठी बैठी
हो गई मै तो तंग
नील गगन की सैर करा दे
ले चल अपने संग

इतना सा अहसान कर दे
पकड़ मेरा हाथ
चुग्गा तुझे खिलाऊँगी
ले चल अपने साथ

काश मेरे भी पंख होते,
मैं भी ऐसे उड़ पाती
तेरे संग संग पूरे जहां के
चक्कर रोज लगाती

पंख मुझे भी ला कर दे दे
सुन चिड़िया मेरी बात
चुग्गा तुझे खिलाऊँगी
ले चल अपने साथ

सोमवार, 13 मई 2013

मातृ दिवस विशेष : Hindi Poem on Mother


दोस्तों, काफी समय बाद वापिस ब्लागर पर आया हूं। इस बार हाजिर हूं माँ पर स्वरचित एक कविता के साथ
कैसी लगी बताएं जरूर

''मां''



एक अजन्मा नन्हा प्राणी 
अपनी नन्ही सी जबान से
अपने सारे दुःख चिन्ता
कहने लगा भगवान से

मैं छोटा सा नन्हा सा प्राणी
दुनिया में कैसे रह पाऊंगा
कौन संभालेगा मुझको वहां
क्या पीऊंगा क्या खाऊंगा

बोल भी ना मैं पाता ढंग से
कैसे समझूंगा वहां की भाषा
खुद से दूर क्यों कर रहे हो
बैठा था यहां अच्छा खासा

चल भी ना मैं पाता ढंग से
दुनिया में कैसे जी पाऊंगा
जो कोई खतरा आया मुझ पर
उसको कैसे झेल पाऊंगा

सारी बातें सुन प्रभु बोले
खतरों की तूं फिकर ना कर
कोई दुःख ना होगा तुझको
इस चीज का जिकर ना कर

इन सभी कामों के लिए
मुझको तूं वहां पाएगा
कभी ना होगा अकेला तूं
मेरा साया साथ जाएगा

वो साया मेरा रूप होगा
तुझको जीना वो सिखाएगा
संग संग अपने ले जाकर
रंग दुनिया के तुझे दिखाएगा

हंसना, खेलना सिखाएगा तुझको
कभी न तुझको रूलाएगा
और हां एक बात सुन
तूं उसे ''मां'' कहकर बुलायेगा।
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