मंगलवार, 2 मई 2017

प्रशांत बिश्नोई के घर से मांस बरामदगी पर प्रतिक्रिया

 मेरठ में प्रशांत बिश्नोई के घर से 117 किलो मांस, दर्जनों बंदूकें और 50 हज़ार कारतूस बरामद।

इस खबर को सुनते ही मेरे पिता की पहली प्रतिक्रिया थी- यह किसी बिश्नोई माँ की संतान नहीं हो सकता।
अपनी माँ से बिछुड़ चुका मृग शावक,एक धवल वस्त्र
धारी बिश्नोई को तपते धोरों में किसी झाड़ी के पास लाचार बेबस सा पड़ा नजर आ जाता है और वो उस छौने को अपने घर ले आता है। घर में बिश्नोई औरत अपने शिशु को स्तनपान करा रही होती है। अब जो अचम्भा होता है, वो विश्व भर में सिर्फ इसी समुदाय में देखा जा सकता है। एक वन्य जीव का शावक किसी मानवी की गोद में प्रश्रय पाता है और उस के स्तनों से दुग्ध का पान करता है। विस्मय! मानव शिशु और हिरण शावक, एक साथ एक मां के आंचल में दुग्ध पान!! ये कोई एक कहानी नहीं है या कोई एक घटना ऐसी घट गई हो, ऐसा भी नहीं है।
बिश्नोईयों की ढाणियों में ये आम बात है।
"जांडी (खेजड़ी) हिरण संहार, देख सिर दीजिये"। मां दूध पीते बच्चे को यही सिखाया करती है। साथ में दूध पी रहा हिरण का बच्चा उसका भाई होता है, उसे वो कैसे मार सकता है। उसके लिए मर जाए, यह जरूर होता आया है, हो रहा है, होता रहेगा।
प्रशांत ने सैंकड़ों हिरण मारे हैं, हम चींटी तक को हाथ में उठा कर दूर करते हैं, कोई जीव मारने का तो कोई सपना भी मुझे देखा याद नहीं आता।
प्रशांत बिश्नोई नहीं है,प्रशांत की मां बिश्नोई नहीं है, उसकी पत्नी बिश्नोई नहीं है, बिश्नोई समाज से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। पिता जरूर खुद को पंवार गोत्र का बिश्नोई कहते हैं, लेकिन मांसाहार के आरोपों के बाद इस परिवार को बिश्नोई समाज से बहिष्कृत किया जा चुका है, 24 साल पहले ही।
ये तथ्य उजागर होने चाहिये।
लोगों तक पहुंचने चाहिए।
इस बात को मीडिया चाहे न दिखाए, हमें सोशल मीडिया से लोगों तक ये बात पहुंचानी ही है। हमारी प्रतिष्ठा का सवाल है।
ये नेशनल शूटर भी नहीं ही है। प्रशांत उर्फ पाशा ने नेशनल लेवल की शूटिंग चैंपियनशिप में सिर्फ इसलिए भाग लिया था, क्योंकि ऐसा प्रावधान है कि नेशनल शूटर्स को विदेशी बन्दूकें मंगाने और उनके लाइसेंस लेने में कोई दिक्कत नहीं होती। उसे इस चैंपियनशिप में 65 वां स्थान मिला। लेकिन स्थान किसे चाहिए था, सहूलियत चाहिए थी।
उसके माता पिता मेरठ में समाज सेवा में भी सक्रिय रहे हैं, अवश्य रहे होंगे, काले कामों को छिपाने के लिए सफेद पर्दा रखना जरूरी होता है। ये समाज सेवा, नेशनल शूटर होने के दावे, बिश्नोई उपनाम की पहचान इन कामों में सहूलियत के लिए थे। केवल सहूलियत के लिए। सहूलियत मिली भी, कितने दिनों से ये खेल चल रहा था, किसे मालूम। प्रशांत की फेसबुक आई डी पर फोटोज भी हैं, बड़े अभिनेताओं के साथ, क्रिकेटर्स के साथ, मुख्यमंत्रियों के साथ।
अभी तक खुद फरार है, पकड़ा नहीं गया। पकड़े जाने और जांच होने पर ही पता लगेगा कि बिहार में लाइसेंस ले कर 250 नीलगाय मारने वाला ये चांडाल अब तक कितने निरीहों का लहू पी चुका है।
कुछ साथियों ने इस के लिए हमारे समाज पर प्रश्न खड़े किए हैं।
ऐसा मत करिये।
हम हिरण शिकार के बाद घटना स्थलों पर रात रात भर रोते रहे हैं, शिकारियों की गोलियां खा कर मरते रहे हैं, उनका विरोध करते रहे हैं, कानूनी लड़ाईयां लड़ते रहे हैं। ऐसे में आप हमें उस व्यक्ति के नाम पर कैसे Judge कर सकते हैं, जिससे उसके कुकृत्यों के कारण हम पहले ही नाता तोड़ चुके हैं। हमें उससे मत जोड़िये। हमारी निष्ठाओं पर प्रश्न चिह्न मत लगाइये। जिस वक्त प्रशांत के घर पर छापा पड़ रहा था, उसी वक्त राजस्थान की खौलती रेत में हम प्यासे हिरण और नीलगायों को पानी पिलाने के लिए व्यवस्थाएं कर रहे थे, घायल हिरणों को पट्टी बांध रहे थे और इस में हमारा कोई स्वार्थ नहीं है, यह केवल प्रेम है, निश्छल, नि:स्वार्थ।
यकीन मानिए, हम इस मामले में बाकी सब मामलों की तुलना में ज्यादा गम्भीर हैं। हम जिस पहचान पर गर्व करते आये हैं, हमारा मुखौटा लगा कर इस व्यक्ति ने उसे ही तार तार कर दिया है। हम इससे दुःखी हैं। हम उसके खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई चाहते हैं। हम पर चुप्पी का आरोप मत लगाईए। मीडिया भले न दिखा रहा हो, हम इसके विरोध में भी उतने ही मुखर हैं, जितने किसी बॉलीवुड विलेन द्वारा शिकार की घटना पर थे।

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