रविवार, 15 सितंबर 2013

जंगल की डेमोक्रेसी

जंगल का राजा शेर, 
हुआ वन से लापता।
कई दिनों तक खोजखबर ली, 
मिला न कोई अता पता।
मिला न कोई अता पता,
सूनी हुई सरकार।
जनता सारी लड़ने लगी,
कर आपस में तकरार।
कर आपस में तकरार,
घोषित बैठक आपात हुई।
चुनाव करा दो इस बार,
तय अंत में यह बात हुई।

वोट हुए जंगल में भी,
अब डेमोक्रेसी आ गई।
बंदर बना राजा जंगल का,


जनता खुशी मना रही।
जनता खुशी मना रही,
शांतिपूर्ण सब काम हुआ।
पर शेर के वापस आने से,
चैन सबका हराम हुआ।
चैन सबका हराम हुआ,
गायब मिला बकरी का बच्चा।
गुहार लगाई राजा जी से,
न्याय करो अब सच्चा सच्चा।

महाराजधिराज बंदर राजा ,
चले जनता के आगे आगे।
जहां बैठा था आतंकवादी,
पहुंचे वहां भागे भागे।
पहुंचे वहां भागे भागे,
खेल रहा शेर बच्चे से।
जनता बोली राजा जी से,
अब सबक सिखाओ अच्छे से।
सबक सिखाओ अच्छे से,
राजा कूदे डाल डाल पर।
कड़ी निंदा करते हुए,
परेशान जनता के हाल पर।

बकरी बोली महाराज,
जल्दी से कुछ एक्शन लो।
बच्चा मेरा मारा जाएगा,
आप जरा तो टेंशन लो।
आप जरा तो टेंशन लो,
राजा बोले डरे डरे।
जो खाएगा वो तो खाएगा,
हम तो इसमें क्या करे।
हम तो इसमें क्या करे,
मत हमें अब सताओ तुम।
हमारी मेहनत में कहीं कोई,
कमी हो तो बताओ तुम।


नोट चित्र अंतरजाल से लिया गया है जिसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन है किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं।

22 टिप्‍पणियां:

  1. क्या खूब लिखा है जनाब,लाजबाब रचना है.

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  2. वाह ,बहुत खूब ,वास्तविकता को चरितार्थ करता

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  3. सामयिक संरचना । सम्यक एवम् सटीक शब्द संयोजन । बधाई ।

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  4. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [16.09.2013]
    चर्चामंच 1370 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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  5. शालीन शब्दों में सुन्दर व्यंग -बहुत सुन्दर

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  6. sundar evem saamyik rachna ..jangal raaj hi hai .. ham praja lagaye guhaar ..:)..badhayi

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  7. बहुत ही मजेदार लगी रचना :)

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