शनिवार, 25 मई 2013

तौलिया और रूमाल

अब जब हर तरफ मैच फिक्सिंग की ही चर्चा है, तो मैं कैसे पीछे रहता, सो लिख डाली एक छोटी सी कविता-

तौलिया और रूमाल

डाल कमर पर तौलिया,बॉलर ने फेंकी बॉल।
पहले से ही तय था, हर बॉल का मोल।।
हर बॉल का मोल,रन सोलह देने है।
मैच पूरा होते ही,साठ लाख लेने है।।

ओवर की तीन गेंदे,चली गई जब खाली।
बॉलर हुआ एन्ग्री,चेहरे पर छाई लाली।।
चेहरे पर छाई लाली,बॉलर बोला बोल।
रन बना मेरे भाई,सोलह का हुआ कौल।।

बैट्समेन ने जवाब दिया,सुन बॉलर का सवाल।
दिखता नहीं क्या तेरे को,मेरे गले का रूमाल।।
मेरे गले का रूमाल,सोलह बनाऊँ कैसे,
जब मैंने भाई से,लिए चार के पैसे।।

24 टिप्‍पणियां:

  1. क्या मजबूरी है भाई बोल्लर और बेट्समेन की आनंद आ गया ..

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    1. आभार। ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें।

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    1. आभार। ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें।

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  3. बहुत ही बेहतरीन प्रयास है भाई,बहुत ही सुन्दर कविता है.

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    1. आभार। ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें।

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  4. शुभम
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (27-05-2013) के :चर्चा मंच 1257: पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ |

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    1. आभार। ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें।

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  5. वक्त के मुताबिक सटीक लेखन

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    1. आभार। ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें।

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  6. हा हा हा... बेहद सार्थक और मजेदार.........

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  7. बेहतरीन
    ब्लॉग का टाइटल अच्छा लगा

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    1. आभार। ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें।

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  8. बहुत सही तू भी फिक्स
    मैं भी फिक्स
    अब कोई करे भी तो क्या करे।।

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    1. हा हा हा! फिक्सिंग का जमाना है

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    1. आभार। ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें।

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  10. धन्यवाद! आभार मार्गदर्शन के लिए

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